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टिप्पणी : हाई कोर्ट में लंबित आपराधिक अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान, जमानत देने के लिए तंत्र विकसित करने की जरूरत

Tue, 05 Oct 2021 02:25 PM IST
प्रशांत कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

 सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया गया था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में 1.8 लाख से अधिक आपराधिक अपीलें लंबित हैं। इसपर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए कहा कि हाईकोर्ट को एक तंत्र विकसित करना चाहिए जहां जमानत याचिका को तुरंत सूचिबद्ध किया जा सके। 
 
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supreme court, सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ani
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विस्तार
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सालों से लंबित आपराधिक अपीलों के निपटारे पर सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया है। हाईकोर्ट की इलाहाबाद और लखनऊ बेंच में 1 लाख 80 हजार अधिक आपराधिक अपीलें लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह सजा काट रहे लोगों को जमानत देने की व्यवस्था बनाने पर जल्द ही सुनवाई करेगा।

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दरअसल, पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया गया था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में 1.8 लाख से अधिक आपराधिक अपीलें लंबित हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अभी न्यायाधीशों के 160 पद स्वीकृत हैं , जबकि 93 न्यायाधीश कार्यरत हैं और अदालत ने 2000 के बाद से 31,044 ऐसी याचिकाओं का निपटारा किया है, फिर भी 1.80 लाख से ज्यादा आपराधिक याचिकाएं लंबित पड़ी हुई हैं। इसपर ध्यान देने की जरूरत है। 

जमानत देने के लिए तंत्र विकसित करने की आवश्यकता
पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पर अनावश्यक बोझ बढ़ाने से पहले दोषी को उच्च न्यायालय का रुख करना चाहिए। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि ऐसे अपराधी हो सकते हैं जिनके पास जमानत याचिका दायर करने के लिए कानूनी सलाह की जरूरत पड़ती हो, लेकिन उन्हें नहीं मिल पाती है। ऐसे में हाई कोर्ट को एक ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए जहां आठ साल की सजा काट चुके दोषियों को आसानी से जमानत मिल सके और जमानत अर्जी को तुरंत सूचीबद्ध किया जा सके।  
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हाईकोर्ट को अपनी बात रखने के लिए चार हफ्तों का मिला वक्त
पीठ ने कहा कि हम उन स्थिति से भी भलिभांति परिचित हैं , जहां सुनवाई के लिए अपील तो की जाती है, लेकिन  अपीलकर्ता मामले पर बहस करने के बजाय स्थगन की मांग करने लगता है। ऐसे मामले में जमानत नहीं मिलनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि हम इलाहाबाद हाई कोर्ट को इस संबंध में अपनी बात रखने के लिए चार हफ्तों का वक्त देते हैं। हम अपने सामने लंबित सभी मामलों पर विचार नहीं कर सकते हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पर पहले से ही बहुत दबाव है। 

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