बचपन में दिनभर बाहर खेलने के बाद घर में घुसते ही मम्मी-पापा की डांट पड़ने के बाद जो बात सबसे ज्यादा सुनने को मिलती थी वो थी "पढोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे तो होंगे खराब"।
बचपन में शायद ही किसी ने यह लाइनें नहीं सुनी हों, उसकी बड़ी वजह थी कि उस समय पढ़ाई लिखाई को ही कामयाब होने का एकमात्र जरिया माना जाता था, लेकिन बदलते दौर के साथ युवाओं ने जमाने की नब्ज पकड़ी और अपनी अलग राह तैयार की।
उन्होंने कामयाब होने के लिए पढ़ाई को एकमात्र जरिया नहीं बनाया बल्कि वक्त की जरूरत को समझा और उसी राह पर आगे बढ़े। बिल गेट्स ने हाईस्कूल पास करते ही अगर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में हाथ न आजमाया होता तो आज दुनिया को माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनी न मिलती। मार्क जुकरबर्ग अगर आगे पढ़ाई में ही लगे रहते तो शायद ही हम और आप फेसबुक इस्तेमाल कर पाते।
सचिन तेंदुल्कर ने अगर पढ़ाई की बजाय अपने पहले प्यार क्रिकेट को प्राथमिकता न दी होती तो देश को शायद ही ऐसा महान बल्लेबाज मिल पाता। पेटीएम के संस्थापक विजय शेखर शर्मा ने अगर इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़कर कुछ नया करने की न सोची होती तो शायद आज वो ये मुकाम न छू पाते।
देश की दिग्गज ई-कामर्स कंपनियों फ्लिपकार्ट, स्नैपडील के संस्थापकों ने कॉलेज की पढ़ाई बीच में छोड़कर ही इस फील्ड में कदम रखे और नए आइडिया के साथ अपनी कंपनियां खड़ी की। देश-विदेश में आज ऐसे तमाम उदाहरण हैं जिन्होंने नया कुछ नया करने और अपने आइडिया पर काम करने के लिए पढ़ाई पूरी होने तक का इंतजार नहीं किया।
उन्होंने खुद पर भरोसा रखा और रिस्क उठाया, दुनिया के तानों और सलाहों को दरकिनार कर अपनी धुन पर आगे बढ़े और कामयाबी को छूकर ही दम लिया। ऐसे में सिर्फ ये कहना है कि बिना पढ़ाई के कामयाब नहीं हुआ जा सकता, सही नहीं है।