गुजरात के चुनाव में किसी का भी योगदान इस पैमाने से नहीं आंका गया कि आप किसान, गृहिणी और उद्यमी के बारे में क्या कह और कर रहे हैं। बल्कि इस बात से आंका गया कि आपके ट्वीट कितनी बार रिट्वीट हुए, आपने कितने तमाशे किए और कितनी नई प्रकार की गालियों का इस्तेमाल किया। अभद्रता, वाणी-विलास और क्षुद्र, घटिया दर्जे की आक्रामकता में लिपटी धार्मिक नौटंकी वाली अभिनय-पटुता वास्तव में गुजरात का अपमान ही कर गई।
क्या गुजरात के मतदाता इस लायक ही हैं?
गुजरात के लोग शिल्प, व्यापार, उद्यम, विद्या, अध्यात्म और नवीन सर्जनाओं के लिए जाने जाते है। दुनिया में गुजराती की एक अलग पहचान है, खासियत का दबदबा है। गुजरात के चुनाव ने बताया कि भारत के नेता सोचते हैं कि गुजराती को मूर्ख बनाया जा सकता है। शायद ऐसा नहीं भी हो। नेताओं ने गुजरात को 2019 की प्राथमिक प्रयोगशाला बना दिया- वे चतुर और बुद्धिमान हैं। इसीलिए गुजरात का चुनाव स्थानीय नहीं, राष्ट्रीय बन गया। एक पादरी साहब भी बोल उठे- पर किसी ईसाई ने उनसे यह नहीं पूछा कि सर ईसा मसीह का पार्टी चुनाव से क्या लेना-देना? करुणा और मैत्री राजनीतिक कर्म है क्या?
भगवान सोमनाथ भी राजनीतिक पाखंड की भेंट चढ़ गए! हम भूल गए सोमनाथ का दर्द, सोमनाथ का संघर्ष, सोमनाथ का मूल स्वर। अठारह बार सोमनाथ पर हमले हुए। अठारह बार हिंदुओं ने उसे बनाया। सिर्फ प्रभास-पाटण के हिंदू नहीं, मध्य भारत से आई थी अहिल्या बाई होल्कर सोमनाथ का पुनर्निर्माण करने के लिए। ये छोटे, अदने चुनाव पीड़ित नेता क्या जानेंगे सोमनाथ को। इन्होंने तो कभी क.मा. मुंशी का जय सोमनाथ तक नहीं पढ़ा होगा, जिसमें एक उच्च शिक्षित जनेऊधारी ब्राह्णण ही गजनी को सोमनाथ के भीतर लाता है, ध्वंस का कारण बनता है।
हिंदू भी बदला नहीं है, इतिहास के थपेड़ों और पराजयों से उसने सीखा नहीं है। उसके लिए आज भी सामूहिक राष्ट्रीय शत्रु से बड़ा शत्रु है भीतरी, पारिवारिक विरोधी। जाति, विद्वेष, अहंकार और व्यक्तिगत लाभालाभ आज भी हिंदू नेताओं और बुद्धिजीवियों के लिए ज्यादा महत्व रखते हैं। कितने राजनेता, उद्योगपति, प्रशासनिक अधिकारी या सामान्य मतदाता सोचते होंगे कि 1947-48 में जन्मे चीन, इस्राइल और हमसे कहीं लघु रूप वाले सिंगापुर, जापान, कोरिया, ताईवान कहां से कहां पहुंच गए और हम अब भी मध्ययुगीन बर्बरता, (राजस्थान, केरल, कर्नाटक में लोमहर्षक घटनाएं) मुहल्ला छाप गाली गलौज तथा ब्राह्मण, ठाकुर, दलित, मुस्लिम, गठजोड़ की राजनीति में धंसे हुए हैं। किसी को गुजरात आकर गोशाला बनाने और स्त्रियों को मंगलसूत्र बांटने की जरूरत होती है, तो उसी पार्टी को केरल में सरेबाजार गाय काटकर उस का सिर घुमाते हुए गोमांस भषण की जरूरत राष्ट्रीय महत्व का विषय लगती है।
गांवों में पानी, स्त्रियों पर अत्याचार, बढ़ती क्रोध-जनित-बर्बर घटनाएं, सांप्रदायिक घृणा और हिंसा में वृद्धि, अस्पतालों की दुर्दशा, निर्माण क्षेत्र में पूंजी का अभाव, विश्व रैंकिंग में अनुपस्थित भारतीय शिक्षा संस्थान, किसान (ऐसे हम उसे छाती ठोंककर 70 फीसदी भारत का ग्रामीण प्रतिनिधि मानते हैं) का राजनीति की मुख्यधारा और अर्थनीति की मुख्य चिंता से दूर होना, दलितों से भेदभाव, वास्तव में ये मुद्दे राष्ट्रीय सहमति के होने चाहिए या राष्ट्रीय गाली नीति के?
क्या हम सब मिलकर भारत को पुनः विफल नहीं कर रहे हैं? देश रहेगा तो हम और हमारी राजनीति भी रहेगी। देश बढ़ेगा, तो हमारी साख भी बढ़ेगी, लेकिन देश टू जी, थ्री जी, अंतरिक्ष कोयला, घोटालों में धंसेगा और हम ऐश्वर्य में जिएंगे तो इससे अच्छा क्या वह गांव का चौधरी नहीं है, जो कहता है, 'फिर अंग्रेजों को क्यों भगाया था?'
वे लोग जो हिम्मत तथा राजनीतिक फायदे नुकसान के तराजू-चिंतन से ऊपर उठकर सोचते थे, दृढ़ता से कठोर शब्द बोलने का साहस रखते थे, आज या तो चले गए या दीवारों पर फ्रेम में टंग गए। वे लोग छाए हैं, जो सोचते हैं कि हमें सिर्फ आज जीना है-कल जाए भाड़ में।
आश्चर्य है कि जिस देश की दो सीमाओं पर परमाणु ताकतों का शत्रुता पूर्ण व्यवहार हो, जिसकी काया हर दिन आतंकवादी हमलों से लहुलुहान होती हो, जिसके भीतर देशभक्त भारतीय शरणार्थी बने घूमते हों, जहां किसान आत्महत्याएं करते हों, प्रदेश सरकारें-तमिलनाडु जैसी राज-अराज में झूलती हों, आंतरिक आतंकवाद इतना हो कि तेरह राज्य नक्सल आतंकवाद से ग्रस्त और विशेष घोषित हों, जहां आज भी बाढ़ और सूखा एक हकीकत और सैकड़ों की जान लेने वाली त्रासदियां हों, जहां लाखों लोग रेल से जूठा बटोरते हों, पटरियों के किनारे प्लास्टिक शीट के 'घरों' में बस जिंदा रहते हों, वहां राजनीति महलों की शतरंज का नवाबी खेल बनी हुई है।
यह देश विद्रोह मांगता है। सड़-गल चुकी, नफरत तथा व्यक्तिगत पसंद नापसंद, प्रचार की भूखी और प्रचार पर निर्भर राजनीति को कूड़ेदान में फेंक उन ईमानदार लोगों की राजनीति लौटा लाने के लिए जो प्रत्येक भारतीय को सुरक्षा, समृद्धि, शिक्षा और स्वास्थ्य का उजाला देगा-वायदा नहीं है। यह देश पाखंडी, शब्द-संयम और शालीनता रहित नेताओं की ऱाष्ट्रघाती राजनीति से थक चुका है। अब नेताओं के शब्दों पर भरोसा नहीं रहा।
गुजरात चुनाव का अनर्थकारी देश, दुर्भाग्य से यही है। और अर्थ यह है कि देश में पंचायत से लेकर विधानसभा तक चुनाव केवल स्थानीय बुखार नहीं मापते। स्थानीय नेताओं का अहंकार भी तौलते हैं। सोचिए, देश में जो भी बदलाव आ रहा है उसे आगे ले जाने के लिए लालू यादव, मणिशंकर अय्यर, ममता बनर्जी या पन्नीरसेलवम योग्य हैं? देश को संभालना या बिखेरना, यह तय अमेरिकी या अरब करेंगे या भारत के मतदाता?
अमर उजाला संपादकीय पेज से साभार