दरअसल, पशु अधिकार कार्यकर्ता गौरी मौलेखी ने पिछले साल एनजीटी का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने मांग की थी कि बूचड़खानों और मांस प्रसंस्करण इकाइयों को ईआईए 2006 के दायरे में लाया जाए। उन्होंने बूचड़खानों में पानी की अधिक खपत, ठोस कचरे के अनुचित तरीके से निपटान से पानी दूषित होने और जूनोटिक (जानवरों से फैलने वाले) रोगों के खतरे को लेकर चिंता जताई थी।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने हाल ही में एनजीटी को एक हलफनामा सौंपा। यह हलफनामा मंत्रालय द्वारा गठित आठ सदस्यीय कार्यसमूह की रिपोर्ट पर आधारित था। इसमें मंत्रालय ने कहा, बूचड़खानों या प्रसंस्करण इकाइयों को पर्यावरण के दृष्टिकोण विनियमित करने के लिए जरूरी दिशानिर्देश या सुरक्षा उपाय पहले से ही मौजूद हैं। बूचड़खानों या मांस प्रसंस्करण इकाइयों को ईआईए 2006 के दायरे में लाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
इसमें कहा गया है कि जिलाधिकारियों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) और कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास (एपीडा) सहित विभिन्न एजेंसियों का विनियमन ढांचा बूचड़खानों और मांस प्रसंस्करण से जुड़े पर्यावरणीय मुद्दों के समाधान के लिए पर्याप्त है। मंत्रालय ने कहा कि ऐसी इकाइयों को ईआईए 2006 के दायरे में लाने से कोई खास मूल्यवर्धन नहीं होगा, क्योंकि केवल पहले मौजूद नियमों के क्रियान्वयन का है।
मंत्रालय ने कहा कि याचिकार्ता (गौरी मौलेखी) की दलीलें खासतौर पर असंगठित बूचड़खानों और मांस प्रस्करण इकाइयों को लेकर हैं। कार्य समूह ने उनके आधुनिकीकरण को प्राथमिकता देने का सुझाव दिया है। कार्य समूह की रिपोर्ट में कहा गया है कि नौ जानवरों तक की क्षमता वाले अवैध बूचड़खाने पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचा रहे हैं और इन्हें अधिक कुशल तरीके से विनियमित किए जाने की जरूरत है।