बनना तो इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग था, मगर आपातकाल और जेपी ने नीतीश कुमार को सियासत का सोशल इंजीनियर बना दिया। सोशल इंजीनियर भी ऐसा जिसने बिहार की राजनीति को बदल कर रख दिया। राज्य की सियासत में अजेय माने जाने वाले लालू प्रसाद को पटखनी देकर खुद अजेय बन बैठे। सातवीं बार मुख्यमंत्री बनने और राज्य का सबसे लंबे कार्यकाल तक सीएम बनने का कीर्तिमान भी उनका इंतजार कर रहा है।
लक्ष्य पाने का जुनून, मृदुभाषी और जिद्दी नीतीश की पहचान
राज्य के नामी स्वतंत्रता सेनानी राम लखन बाबू के घर 1 मार्च, 1951 को जन्मे नीतीश सियासत के लिए नहीं बने थे। मेधावी छात्र रहे नीतीश उस दौरान बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग कर रहे थे। इसी बीच देश पर थोपे गए आपातकाल के खिलाफ लड़ाई के बीच जेपी की अगुवाई में आंदोलन में कूदे नीतीश ने सरकारी सेवा की जगह राजनीति शुरू कर दी।
धीरे-धीरे चमका करियर
नीतीश के सियासी करियर ने साल 1985 में करवट ली। इसी साल पहली बार विधानसभा चुनाव जीते, इसके दो साल बाद युवा लोकदल के अध्यक्ष और फिर दो साल बाद जनता दल के महासचिव बने। साल 1989 में पहली बार लोकसभा चुनाव जीते।
नीतीश को अनदेखी बर्दाश्त नहीं
नीतीश को अनदेखी बर्दाश्त नहीं। लक्ष्य हासिल करने की जिद्द नीतीश की पहचान है तो अनदेखी अस्वीकार्य। कम बोलना व मौके की नजाकत को गहरे तक भांपना उनका स्वभाव है। अपनी अनदेखी के कारण लालू प्रसाद का प्रबल समर्थक होने के बाद विरोध शुरू किया।
अटल बिहारी वाजपेयी कार्यकाल में बढ़ा कद
वाजपेयी कार्यकाल (1998 से 2004) में नीतीश का सियासी कद बढ़ा। उन्हें रेल और कृषि जैसे अहम मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। भाजपा ने लालू को शिकस्त देने के लिए पिछड़ी जाति के नीतीश के कंधे पर हाथ रखा। सियासी कद बढ़ने के साथ नीतीश आगे बढ़ते गए।