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OTT Platforms: मोहन भागवत ने इस पर नियंत्रण की मांग की तो छिड़ गई बहस, जानिए क्या है विशेषज्ञों की राय

प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Fri, 15 Oct 2021 03:35 PM IST

सार

हम चलते-फिरते मनोरंजन के युग में जी रहे हैं। ओटीटी प्लेटफार्मों के तेजी से उभरने के बाद हम जब चाहें जैसे चाहें अलग-अलग तरह के शो और कार्यक्रमों से अपना मनोरंजन कर सकते हैं। लेकिन क्या ये ओटीटी प्लेटफॉर्म बेकाबू हैं। 
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मोहन भागवत, संघ प्रमुख - फोटो : ANI
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना दिवस और विजयादशमी के मौके पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में अपने संबोधन में ओवर-द-टॉप (OTT) प्लेटफॉर्म को लेकर कहा कि इस पर जो कुछ दिखाया जाता है, उस पर कोई नियंत्रण नहीं है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि ओटीटी के लिए सामग्री नियामक ढांचा के तहत हो। सरकार को इसके लिए प्रयास करना चाहिए। उनके इस बयान के बाद इस बात पर फिर बहस छिड़ गई है कि क्या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर नियंत्रण की जरूरत है?

कोरोना महामारी के दौरान लॉकडॉउन लगने और लंबे समय तक लोगों के घरों में बंद रहने के दौरान  नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, डिज़नी + हॉटस्टार, जी प्राइम, सोनी लिव और वूट समेत ओटीटी प्लेफॉर्म का क्रेज लोगों में खूब देखा गया। इस दौरान सिनेमाहॉल भी बंद रहे तो लोगों ने ओटीटी के जरिए ही अपना मनोरंजन किया। आए दिन नए-नए वेबसीरीज बनने लगे और उसे अलग-अलग ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाया जाने लगा। ओटीटी ने सिनेमाघरों, बड़े सितारों और बड़े घरानों का वर्चस्व समाप्त किया।




ओटीटी प्लेटफॉर्म के आने से छोटे कलाकारों और नए लोगों को मौके मिलने लगे। स्क्रिप्ट पर काम शुरू हुआ। लेकिन कई वेबसीरीज में हिंसा, नग्नता और अश्लीलता की भरमार के कारण इसकी खूब आलोचना भी होने लगी। आरोप यह लगने लगे कि सिनेमाहॉलों का एकाधिकार समाप्त करने और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण हिंसा और नग्नता का सहारा लिया जाने लगा। इसके पीछे की एक बड़ी वजह यह मानी गई कि टीवी चैनलों की तुलना में, ओटीटी प्लेटफार्मों को अब अधिक रचनात्मक स्वतंत्रता प्राप्त है क्योंकि वर्तमान में इसके लिए कोई नियम नहीं है। हमने इस विषय पर अलग-अलग विशेषज्ञों की राय जानने की कोशिश की। 
 
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मोहन भागवत, संघ प्रमुख - फोटो : ANI
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना दिवस और विजयादशमी के मौके पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में अपने संबोधन में ओवर-द-टॉप (OTT) प्लेटफॉर्म को लेकर कहा कि इस पर जो कुछ दिखाया जाता है, उस पर कोई नियंत्रण नहीं है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि ओटीटी के लिए सामग्री नियामक ढांचा के तहत हो। सरकार को इसके लिए प्रयास करना चाहिए। उनके इस बयान के बाद इस बात पर फिर बहस छिड़ गई है कि क्या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर नियंत्रण की जरूरत है?

कोरोना महामारी के दौरान लॉकडॉउन लगने और लंबे समय तक लोगों के घरों में बंद रहने के दौरान  नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, डिज़नी + हॉटस्टार, जी प्राइम, सोनी लिव और वूट समेत ओटीटी प्लेफॉर्म का क्रेज लोगों में खूब देखा गया। इस दौरान सिनेमाहॉल भी बंद रहे तो लोगों ने ओटीटी के जरिए ही अपना मनोरंजन किया। आए दिन नए-नए वेबसीरीज बनने लगे और उसे अलग-अलग ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाया जाने लगा। ओटीटी ने सिनेमाघरों, बड़े सितारों और बड़े घरानों का वर्चस्व समाप्त किया।



ओटीटी प्लेटफॉर्म के आने से छोटे कलाकारों और नए लोगों को मौके मिलने लगे। स्क्रिप्ट पर काम शुरू हुआ। लेकिन कई वेबसीरीज में हिंसा, नग्नता और अश्लीलता की भरमार के कारण इसकी खूब आलोचना भी होने लगी। आरोप यह लगने लगे कि सिनेमाहॉलों का एकाधिकार समाप्त करने और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण हिंसा और नग्नता का सहारा लिया जाने लगा। इसके पीछे की एक बड़ी वजह यह मानी गई कि टीवी चैनलों की तुलना में, ओटीटी प्लेटफार्मों को अब अधिक रचनात्मक स्वतंत्रता प्राप्त है क्योंकि वर्तमान में इसके लिए कोई नियम नहीं है। हमने इस विषय पर अलग-अलग विशेषज्ञों की राय जानने की कोशिश की। 
 

अमेजन प्राइम वीडियो - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अब यह कोई मुद्दा नहीं
जाने-माने ट्रेड पंडित और फिल्म समीक्षक जोगेंदर टुटेजा मानते हैं कि दो साल पहले जरुर ऐसा था कि कंटेट कुछ आपत्तिजनक होते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है, क्योंकि सेल्फ रेगुलेशन आ गया है। सीक्रेट गेम की पहले सीजन में नग्नता ज्यादा थी, लेकिन जब निर्माताओं को इस पर प्रतिक्रिया मिली कि यदि बड़े दर्शकों तक पहुंचने के लिए ऐसे दृश्यों का होना जरूरी नहीं है तो सेकंड सीजन में ऐसा नहीं था। इसलिए सेल्फ रेगुलेशन करना जरूरी है। मुझे ऐसा नहीं लगता है कि अब यह कोई मुद्दा है।  

उनका मानना है कि यह उपभोक्ताओं पर निर्भर करता है कि वह क्या और कैसा देखना चाहते हैं। दुनिया के साथ चलना है तो हमें उनके साथ ही चलना चाहिए। जिसको आपत्तिजनक कंटेंट नहीं देखने है वह नहीं देखेगा। 90 फीसदी कंटेंट तो बाहर से आ रहे हैं, कहां-कहां तक नियंत्रण किया जा सकता है। 

सरकार कोई बॉडी बनाना चाहती है
फिल्म समीक्षक मीहिर पंड्या कहते हैं कि अभी ऐसी कोई संस्था नहीं है जो इस पर नियंत्रण रख सके। इस तरह के बयानों और सरकार की फरवरी में जो गाइडलाइन आई है उसे देखकर ऐसा लगता है सरकार इस तरह की कोई संस्था या ब़ॉडी बनाना चाहती है जो ओटीटी प्लेफॉर्म को भी सिनेमा की तरह रेगुलेट कर सके। कई ऐसे आपत्तिजनक कंटेंट हैं जो इंटरनेट के माध्यम से आ रहे हैं, लेकिन सरकार इंटरनेट पर रोक नहीं लगा सकती। यदि इंटरनेट पर हैं तो ओटीटी पर सेंसर लगाने का कोई फायदा नहीं होगा। इंटरनेट को कोई नियंत्रण में नहीं रख सकता और एक लोकतांत्रिक मुल्क में इस तरह की कोशिश होनी भी नहीं चाहिए। 

 

सोनी लिव (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
नियंत्रण की जरुरत नहीं
सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना को जगाने वाले वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र त्रिपाठी कहते हैं कि यह बात ठीक है कि कुछ अनुपात में आपत्तिजनक कंटेट परोसे जा रहे हैं, लेकिन फिर भी मेरा मानना है कि इस पर नियंत्रण की जरूरत नहीं है, क्योंकि जैसे ही आप किसी चीज को नियंत्रण में लेने की कोशिश करते हैं सकारात्मकता की जगह नकारात्मकता फैलती है। ओटीटी प्लेटफॉर्म को नियंत्रण करना समाज को बंद करने जैसा है, क्योंकि पूरी दुनिया जहां जा रही है यदि आप वहां नहीं हैं तो पीछे हैं। इसलिए ओटीटी पर आने वाले आपत्तिजनक कंटेट को रोकने के लिए चेतना फैलाने का काम होना चाहिए।  

अच्छे कंटेंट पर भी लग जाएगा विराम
फिल्मों पर लिखने वाली एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि वैसे जब से सरकार ने ओटीटी को लेकर नई गाडलाइंस जारी की है, कंपनियों ने बहुत हद तक गाली-गलौज, हिंसात्मक और अश्लील दृश्यों पर खुद ही लगाम कस लिया है। यदि सरकार ज्यादा सख्ती करती है तो ओटीटी पर आने वाले अच्छे शो और कंटेट पर भी विराम लग जाएगा। यदि आप यह सोचते हैं कि केवल ओटीटी प्लेटफॉर्म ही अश्लीलता फैलाते हैं तो आप गलत हैं, इंटरनेट के माध्यम से लाखों की संख्या में ऐसे अश्लील वीडियोज मौजूद हैं, क्या सरकार उस पर नियंत्रण रख पाएगी? 

 

डिजनी प्लस हॉटस्टार (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
कैंची न चले, लेकिन अंकुश तो हो
जाने माने फिल्म समीक्षक, लेखक और फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड के सदस्य दीपक दुआ एक अलग राय रखते हैं। उनका कहना है कि ओटीटी पहले भी था लेकिन लोगों ने इसे ज्यादा तब देखना शुरु किया जब कोरोना के कारण लॉकडाउन लगा और लोग घरों में बंद हुए। लेकिन यहां जिस तरह के कंटेट दिखाए जा रहे हैं वह हमारे समाज के अनुरुप नहीं है। भारतीय समाज में अभी भी उस तरह का खुलापन और उदारवाद नहीं आ पाया है। जिस तरह का समाज होता है उसके अलिखित नियम के हिसाब से उठना-बैठना पड़ता है।

उनका कहना है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म कहीं न कहीं अपनी हदें तोड़ने की कोशिश करते हैं। इसलिए सेंसरशीप अंदर से आना चाहिए। मैं यह नहीं मानता कि इस पर सेंसरशीप लागू होना चाहिए, लेकिन कुछ न कुछ तो नियंत्रण हो। ओटीटी के कंटेंट में यदि हिंसा और अश्लीलता जैसी चीजें ठूंसी हुई हैं, तो अंकुश रखने की बात होनी चाहिए। मैं कैंची चलाने के पक्ष में तो नहीं हूं अंकुश रखने के पक्ष में हूं। अभिव्यक्ति की आड़ में उत्श्रृंखलता नहीं होनी चाहिए। 

कितनी तेजी से बढ़ रहा है यह बाजार
कोरोना महामारी ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए वरदान साबित हुए और इस दौरान इसका बड़ा बाजार तैयार हुआ है। अभी 40 से ज्यादा ओटीटी प्लेटफॉर्म मौजूद हैं। इंक 42 डॉट कॉम की रिपोर्ट के मुताबिक 2024 तक भारत में ओटीटी का बाजार 2.9 अरब डॉलर का होने वाला है। वहीं प्रइसवाटरहाउसकूपर्स (पीडब्ल्यूसी) की पिछले साल की एक रिपोर्ट भी यही बताती है कि भारत वर्तमान में ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए सबसे तेजी से बढ़ने वाला बाजार है।  2024 तक 2.9 बिलियन डॉलर के राजस्व के साथ छठा सबसे बड़ा ओटीटी बाजार बनने का अनुमान लगाया जा रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय फिल्म उद्योग सबसे बड़ा है, जो हर साल लगभग 1250 फीचर फिल्में और इससे भी ज्यादा लघु फिल्में बनाता है। महामारी के कारण सिनेमाघरों कई महीनों तक बंद रहे और कई निर्माता अपनी फिल्मों को सीधे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ले आए। जहां उन्हें सीधा लाभ मिला। ऑनलाइन वेब सीरीज की लोकप्रियता इस दौरान चरम पर रही और इसके बाजार में उछाल आया। 
 

गौरव गांधी, निदेशक और महाप्रबंधक, अमेजन प्राइम वीडियो, इंडिया (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अमेजन प्राइम वीडियो इंडिया के निदेशक और महाप्रबंधक गौरव गांधी ने मीडिया को दिए साक्षात्कार में यह स्वीकार किया था कि कोविड महामारी के कारण सब्सक्रिप्शन और इंगेजमेंट में काफी इजाफा हुआ था। ओटीटी के दूसरे अधिकारियों का कहना है कि फिल्मों के प्रीमियर तुरंत और नए शो को लगातार दिखाने की रणनीति महत्वपूर्ण है, लेकिन सामग्री की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है। अनुमान यह है कि भले ही सिनेमाघर खुल जाएं लोगों को वहां वापिस जाने में समय लगेगा, इसलिए वेब सामग्री में जोखिम लेना पड़ रहा है। 

दर्शकों को सीधे पेश की जाती है सेवा
ओवर द टॉप (ओटीटी) मीडिया सेवाएं इंटरनेट की मदद से दर्शकों को सीधे पेश की जाती हैं। यह एक स्ट्रीमिंग मीडिया सेवा है जो उपग्रह, डीटीएच, केबल आदि जैसे प्लेटफार्मों से आगे निकल गई है। भारत में चल रहे नेटफ्लिक्स, वूट, हॉटस्टार, अमेजन प्राइम जैसे ओटीटी प्लेटफार्मों के जरिए परोसी जाने वाली सामग्री को नियंत्रित करने के लिए कोई नियामक निकाय नहीं है और इसलिए दर्शक और निर्माता दोनों स्वतंत्रता का आनंद ले रहे हैं।

युवा वर्ग का बड़ा हाथ
ओटीटी की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे युवा वर्ग का सबसे बड़ा हाथ माना जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि डिजिटल मीडिया पर नियंत्रण के लिए अब तक कोई स्वायत्त संस्था नहीं थी, इसलिए ओटीटी पर बड़े पैमाने पर हिंसा से लेकर नग्नता और अश्लीलता परोसी जा रही है। इसलिए इसे नियंत्रण में लाने की जरूरत बताई गई और इस पर बहस तेज हुई।  इसे लेकर कई बार हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता जताई थी।

 

केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय - फोटो : फाइल
सरकार निगरानी के दायरे में लेकर आई
अमेजन प्राइम वीडियो पर पॉलिटिकल थ्रिलर वेब सीरीज तांडव के रिलीज से छिड़े विवाद के बाद ओटीटी पर परोसे जा रहे कंटेंट को लेकर काफी बहस छिड़ी थी। तांडव सीरीज पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया गया था। नॉर्थ-ईस्ट मुंबई से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सासंद मनोज कोटक ने सूचना-प्रसारण मंत्रालय से इसे बैन करने की मांग की और सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने अमेजन प्राइम से जबाव-तलब किया।

इसके बाद केंद्र ने ओटीटी, न्यूज पोर्टल और डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए नए नियम बनाए और कहा गया कि आपत्तिजनक कंटेट को 24 घंटे में हटाना होगा। OTT प्लेटफॉर्म के लिए त्रि-स्तरीय तंत्र बनाया गया है। सरकार ने इसके लिए नई गाइडलाइंस जारी की है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्थानों के लिए दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 को इसी साल 25 फरवरी को अधिसूचित किया गया है। जबकि आलोचकों का कहना है कि सरकार पहले ही मुख्यधारा की पत्रकारिता पर नजर रखे हुए है अब ओटीटी को नियंत्रण करने की कोशिश की जा रही है। 

 
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