राक्षस को मारने के लिए भगवान अयप्पा ने युद्ध किया तो देव अयप्पा ने उस राक्षसी पर विजय हासिल की। लेकिन हार के बाद यह खुलासा हुआ कि वह राक्षसी वास्तव में एक सुंदर युवा महिला थी, जो किसी श्राप की वजह से राक्षसी बन गई थी। इस हार के बाद राक्षसी को इस अभिशाप से मुक्ति मिल गई और उसे देव अयप्पा से बहुत प्यार हो गया। लेकिन उसके प्रेम प्रस्ताव को खारिज करते हुए देव अयप्पा ने कहा कि उन्हें वन में जाकर भक्तों की प्रार्थना सुनने का आदेश मिला है। जब युवती अपनी जिद पर अड़ी रही तो आखिरकार देव अयप्पा ने उससे यह वादा किया कि जिस दिन कन्नी-स्वामी (नए भक्त) सबरीमाला में उनके सामने आकर प्रार्थना करना बंद कर देंगे, उस दिन वे उस युवती से शादी कर लेंगे।
युवती इस बात पर राजी हो गई और पास के एक मंदिर में बैठकर इंतजार करने लगी जहां आज उसकी भी पूजा की जाती है। मंदिर में वह देवी मलिकपुरथम्मा के रूप में स्थापित हैं। इस वजह से देवी मलिकपुरथम्मा के सम्मान में देव अयप्पा किसी रजस्वला स्त्री का अपने यहां स्वागत नहीं करते। इस मान्यता का सम्मान करते हुए ज्यादातर औरतें खुद ही देव अयप्पा के मंदिर में नहीं जाती थीं ताकि देवी मलिकपुरथम्मा के प्यार और बलिदान का अपमान न हो।
मंदिर में उत्सव
यहां दो प्रमुख उत्सव होते हैं. मकर संक्रांति और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के संयोग के दिन, पंचमी तिथि और वृश्चिक लग्न के संयोग के समय ही श्री अयप्पन का जन्मदिवस मनाया जाता है। उत्सव के दौरान अयप्पन का घी से अभिषेक किया जाता है। मंत्रों का जोर-जोर से उच्चारण होता है. परिसर के एक कोने में सजे-धजे हाथी दिखते हैं तो पूजा के बाद चावल, गुड़ और घी से बना प्रसाद 'अरावणा' बांटा जाता है।