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सबरीमाला मंदिर का रहस्य, जहां महिलाओं के प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट को देना पड़ा दखल

Sat, 29 Sep 2018 01:39 PM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला
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सबरीमाला मंदिर
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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को असंवैधानिक बता कर सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के हक में फैसला सुनाया है। केरल का बेहद प्राचीन और पारंपरिक मंदिर इससे पहले भी विवादों में रहा है। ये मंदिर अपने आप में कई रहस्य और धरोहर समेटे हुए है। केरल का प्राचीन मंदिर की राजधानी तिरुवनंतपुरम से 175 किलोमीटर दूर है और पहाड़ियों पर स्थित है ।  सबरीमाला मंदिर चारों तरफ से 18 पहाड़ियों से घिरा हुआ है और इसके आस-पास का जंगल टाइगर सेंचुरी है।
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इस मंदिर से पांच किलोमीटर दूर पंपा तक कोई गाड़ी लाने का रास्ता नहीं हैं, इसी वजह से पांच किलोमीटर पहले ही उतर कर यहां तक आने के लिए पैदल यात्रा की जाती है. इस मंदिर तक पहुंचने के लिए 18 पावन सीढ़ियों को पार करना पड़ता है, जिनके अलग-अलग मायने बताये गये हैं। पहली पांच सीढियों को मनुष्य की पांच इन्द्रियों से जोड़ा गया है, इसके बाद वाली 8 सीढ़ियों को मानवीय भावनाओं से जोड़ा गया है, अगली तीन सीढियों को मानवीय गुण और आखिरी दो सीढ़ियों को ज्ञान और अज्ञान का प्रतीक माना जाता है। अगर इस मंदिर तक पहुंचने के सास्ते आध्यात्मिक ज्ञान से भरे हुए हैं तो सदियों से महिलाओं को इससे क्यों वंचित रखा गया?आइये जानते हैं इसके पीछे की मान्यतायें...

क्या है इतिहास?
 
कंब रामायण, महाभारत के अष्टम स्कंध और स्कंदपुराण के असुर कांड में जिस शिशु शास्ता का जिक्र है, अयप्पन उसी के अवतार माने जाते हैं। उन्हीं का मंदिर अयप्पन का मशहूर मंदिर पूणकवन के नाम से विख्यात 18 पहाड़ियों के बीच स्थित है। इस मंदिर को लेकर कई मान्यताएं हैं, माना जाता है परशुराम ने अयप्पन पूजा के लिए सबरीमला में मूर्ति स्थापित की थी।  गौर करने वाली बात यह है कि कुछ लोग इसे शबरी से भी जोड़कर देखते हैं। सवाल उठता है कि जिस मंदिर का नाम शबरी के नाम से जुड़ा हो वहां महिलाओं के प्रवेश पर रोक क्यों था?
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मंदिर में अयप्पन के अलावा मालिकापुरत्त अम्मा, गणेश और नागराजा जैसे उप देवताओं की भी मूर्तियां हैं। महिलाओं को प्रवेश से वंचित रखने को लेकर जहां मंदिर की काफी आलोचना हुई वहीं कुछ मामलों को लेकर तारीफ भी की जाती है। इस मंदिर में ना तो जात-पात का कोई बंधन और ना ही अमीर-गरीब का।  यहां प्रवेश करने वाले सभी धर्म, सभी वर्ग के लोग समान हैं।  

यहां आने वाले लोगों को दो महीने मांस-मछली और तामसिक प्रवृत्ति वाले खाद्य पदार्थों का त्याग करना पड़ता है.  मान्यता है कि अगर कोई भक्त तुलसी या रुद्राक्ष की माला पहनकर व्रत रखता है तो उसकी मुराद पूरी हो जाती है।  

क्यों भगवान अयप्पा को नहीं पूज सकती थी महिलायें?
पुराणों और जनश्रुतियों से निकली कहानियों के अनुसार, देव अयप्पा का जन्म भगवान शिव और भगवान विष्णु के संयोग से हुआ था। असल में एक खतरनाक राक्षस भष्मासुर के वध के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी का वेश रचा था। भष्मासुर देवताओं से वह अमृत छीनना चाहता था जो समुद्र मंथन से निकला था। तो कथा यह है कि भगवान शिव भी विष्णु के इस मोहिनी रूप से मोहित हो गए और दोनों के संयोग से देव अयप्पा का जन्म हुआ। 

 

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मलिकपुरथम्मा मंदिर
राक्षस को मारने के लिए भगवान अयप्पा ने युद्ध किया तो देव अयप्पा ने उस राक्षसी पर विजय हासिल की। लेकिन हार के बाद यह खुलासा हुआ कि वह राक्षसी वास्तव में एक सुंदर युवा महिला थी, जो किसी श्राप की वजह से राक्षसी बन गई थी। इस हार के बाद राक्षसी को इस अभिशाप से मुक्ति मिल गई और उसे देव अयप्पा से बहुत प्यार हो गया। लेकिन उसके प्रेम प्रस्ताव को खारिज करते हुए देव अयप्पा ने कहा कि उन्हें वन में जाकर भक्तों की प्रार्थना सुनने का आदेश मिला है। जब युवती अपनी जिद पर अड़ी रही तो आखिरकार देव अयप्पा ने उससे यह वादा किया कि जिस दिन कन्नी-स्वामी (नए भक्त) सबरीमाला में उनके सामने आकर प्रार्थना करना बंद कर देंगे, उस दिन वे उस युवती से शादी कर लेंगे। 

युवती इस बात पर राजी हो गई और पास के एक मंदिर में बैठकर इंतजार करने लगी जहां आज उसकी भी पूजा की जाती है।  मंदिर में वह देवी मलिकपुरथम्मा के रूप में स्थापित हैं। इस वजह से देवी मलिकपुरथम्मा के सम्मान में देव अयप्पा किसी रजस्वला स्त्री का अपने यहां स्वागत नहीं करते। इस मान्यता का सम्मान करते हुए ज्यादातर औरतें खुद ही देव अयप्पा के मंदिर में नहीं जाती थीं ताकि देवी मलिकपुरथम्मा के प्यार और बलिदान का अपमान न हो।

मंदिर में उत्सव 
यहां दो प्रमुख उत्सव होते हैं. मकर संक्रांति और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के संयोग के दिन, पंचमी तिथि और वृश्चिक लग्न के संयोग के समय ही श्री अयप्पन का जन्मदिवस मनाया जाता है। उत्सव के दौरान अयप्पन का घी से अभिषेक किया जाता है। मंत्रों का जोर-जोर से उच्चारण होता है.  परिसर के एक कोने में सजे-धजे हाथी दिखते हैं तो पूजा के बाद चावल, गुड़ और घी से बना प्रसाद 'अरावणा' बांटा जाता है। 
 
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