पार्टी को भरोसा है कि यदि वह अकेले दम पर चुनाव लड़ेगी, तब देश की तरह दिल्ली में भी उसका परंपरागत वोट बैंक उसके पास आएगा। 2012-13 में अरविंद केजरीवाल के उभार के बाद कांग्रेस का वोट बैंक खिसक कर आम आदमी पार्टी के पास चला गया था, जिसका कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ और वह दिल्ली में तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गई। यही कारण है कि जब पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन का एलान किया, पार्टी के कुछ नेताओं ने इससे घोर असहमति जताई और कुछ ने पार्टी को अलविदा तक कह दिया।
नौ-दस जून को होगी बैठक
चार जून को चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस के कुछ नेताओं ने पांच जून को दिल्ली इकाई के नेताओं के साथ बैठक की थी। इसमें चुनाव परिणामों की समीक्षा की गई थी। नौ-दस जून को कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के साथ दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ पदाधिकारियों की एक मीटिंग बुलाई गई है। इस बैठक में दिल्ली में हुए गठबंधन की पूरी समीक्षा की जाएगी। इसके अनुसार दिल्ली विधानसभा चुनावों में उतरने की रणनीति तैयार की जाएगी।
पिछले तीन लोकसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) में कांग्रेस दिल्ली में अपना खाता भी नहीं खोल पाई। 2015 और 2020 के विधानसभा चुनावों में भी उसे कोई सफलता नहीं मिली थी। लेकिन अब कांग्रेस को पूरा विश्वास है कि अब वह अपनी जीत का सूखा खत्म कर दिल्ली की राजनीति में वापसी कर सकेगी।
चुनाव परिणामों और आगे की रणनीति पर विचार
दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र यादव ने अमर उजाला से कहा कि वे लोकसभा चुनाव परिणामों की समीक्षा कर रहे हैं। अगले दो दिनों के बीच केंद्रीय नेतृत्व के साथ इस मुद्दे पर एक बैठक है और उसमें चुनाव परिणामों और आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा। बैठक में गठबंधन के असर की भी समीक्षा की जाएगी। पार्टी के जो नेता गठबंधन से असहमति जताते रहे थे, उनसे भी उनकी राय पूछी जाएगी।
देवेंद्र यादव ने कहा कि विधानसभा चुनाव में वे समय रहते वे हर क्षेत्र में योग्य उम्मीदवारों की पहचान करेंगे। उन्हें विधानसभा चुनाव के लिए तैयार कर चुनावी मैदान में उतारेंगे। इसके लिए पार्टी के सभी नेताओं-कार्यकर्ताओं की राय ली जाएगी। लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव में जाने से पहले संगठन में कुछ बड़े बदलाव किए जाएंगे, जिससे पार्टी को निचले स्तर पर मजबूत बनाया जा सके।