सुप्रीम कोर्ट में भले ही सरकार ने जाति आधारित जनगणना कराने से हाथ खड़े कर लिए हैं, मगर यह अध्याय अभी खत्म नहीं हुआ है। इस मामले में विपक्ष की ओर से राजद प्रमुख लालू प्रसाद और बसपा प्रमुख मायावती ने सरकार पर हमला बोला है। हालांकि भाजपा की निगाहें जदयू समेत उन सहयोगियों पर है, जिन्होंने इस आशय की मांग सरकार के समक्ष रखी थी।
विवाद बढ़ने पर तकनीकी समस्याएं बताएगी सरकार, फिलहाल नीतीश के रुख पर है नजर
विवाद बढ़ा तो सरकार सहयोगी दलों को तत्काल जातीय जनगणना की राह की तकनीकी समस्याओं की जानकारी देगी। इसके अलावा भविष्य में पूर्व तैयारी के बाद जातीय जनगणना कराने का प्रस्ताव भी रखेगी। गौरतलब है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भी जातीय जनगणना की राह की तकनीकी और प्रशासनिक दुश्वारियों का हवाला देते हुए इस बार की राष्ट्रीय जनगणना में ऐसा कर पाने में असमर्थता जताई है।
क्या है तकनीकी समस्या
दरअसल अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग जातियां अलग-अलग जातीय वर्ग में हैं। एक जाति किसी राज्य में ओबीसी की श्रेणी में है तो दूसरे राज्य में सामान्य श्रेणी में। इसी प्रकार कई ऐसी जातियां हैं जिसे किसी राज्य में एससी-एसटी का दर्जा है तो कहीं ओबीसी का दर्जा हासिल है। इसी कारण 2011 की राष्ट्रीय जनगणना में जातीय आंकड़े जुटाने का प्रयास सफल नहीं हुआ।
गृह मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि जातीय जनगणना कराने से पहले राज्यवार जातियों की स्थिति का अध्ययन कराना होगा। अलग-अलग राज्यों के जनगणना कर्मियों के लिए अलग-अलग प्रश्नावली और फाॅर्म तैयार करने होंगे। अलग-अलग तरीके से प्रशिक्षित करना होगा। चूंकि नई जनगणना की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जा चुका है। ऐसे में तत्काल राष्ट्रीय जनगणना के साथ जातीय गणना संभव नहीं है।
नीतीश के रुख पर नजर
जातीय जनगणना कराने के मामले में सहयोगियों में से सबसे अधिक मुखर जदयू है। हालांकि दूसरे सहयोगी अपना दल और आरपीआई ने भी इसकी मांग की थी। इस आशय की मांग को लेकर बिहार के सीएम नीतीश की अगुवाई में बिहार का सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल पीएम मोदी से मिला था। नीतीश ने कहा था कि अगर केंद्र इसके लिए राजी नहीं हुआ तो राज्य सरकार अलग से जातीय जनगणना कराएगी।