बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर हिंदू घरों और मंदिरों में तोड़फोड़ हो रही है। अल्पसंख्यकों खासकर हिंदुओं के खिलाफ ये हिंसा अगस्त से जारी है। इसे लेकर भारत में भी सियासत हो रही है। वहीं, उत्तर प्रदेश के संभल में हुई हिंसा पर भी सियासत जारी है। इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में इन्हीं पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी और अवधेश कुमार मौजूद रहे।
समीर चौगांवकर: योगी आदित्यनाथ ने 'जब बंटेंगे तो कटेंगे' कहा और उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'एक हैं तो सेफ हैं' कहा तो उसके बाद से जो मोमेंटम मिला, भाजपा उसे 2027 तक बनाए रखना चाहेगी। संभल में जो पत्थरबाजी हुई और उसके बाद रामगोपाल यादव का जो बयान आया, इन सब चीजों के बाद समाज में एक संदेश गया। राहुल गांधी संभल जाने को तैयार हैं, समाजवादी पार्टी संभल जाने को तैयार है, तो क्या इन लोगों ने बहराइच में जो हत्या हुई, उस पर इस तरह की बात कही?
विनोद अग्निहोत्री: हम देख ही नहीं पा रहे हैं। देश में हर कोई बांग्लादेश पर बोल रहा है। कोई कम बोल रहा है, कोई ज्यादा बोल रहा है। मुस्लिम बुद्धिजीवी भी बोल रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री भी पीसकीपिंग फोर्स भेजने की बात कर चुकी हैं, लेकिन हमें दिखाई नहीं दे रहा है क्योंकि हम भी सिलेक्टिव हो गए हैं। हर कोई सिलेक्टिव हो गया है। राजनीतिक दल हों, मीडिया हो या विश्लेषक, हर कोई सिलेक्टिव हो रहा है। बांग्लादेश में खालिदा जिया के समर्थक वैसे ही ध्रुवीकरण कर रहे हैं, जैसे भारत में होता है। मोहम्मद यूनुस संभाल नहीं पा रहे हैं। इन सबके बीच भारत सरकार ने जो कदम उठाया है, उससे मुझे उम्मीद है कि कुछ बेहतर रास्ता निकलेगा।
अवधेश कुमार: घटनाओं को देखने का दृष्टिकोण क्या हो गया है? बांग्लादेश में जब दिखाई दे रहा था कि अमेरिका और पाकिस्तान पोषित हिंसा हो रही थी और शेख हसीना को निकाला जा रहा था, तब विपक्ष और देश के अल्पसंख्यक बुद्धिजीवियों का क्या रुख था? किसी का कोई एक बयान दिखा दीजिए, जिसने इसका विरोध किया हो। अब जब स्थिति भयावह हो गई, तब इस तरह के बयान सामने आ रहे हैं।
पूर्णिमा त्रिपाठी: हर कोई अपने-अपने हाथ में रोटी लेकर सेंक रहा है। हर कोई वोट बैंक के हिसाब से अपनी चिंता जता रहा है। बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार हो रहा है। इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन उसकी आड़ में आप यहां जो आग लगा रहे हैं, वो बहुत खतरनाक है। हर नेता को यह सोचना पड़ेगा कि हम अपनी आगे की पीढ़ियों के लिए क्या छोड़ कर जा रहे हैं?
रामकृपाल सिंह: कई बार हम लोग यह बात करते हैं कि ये सरकार की खुफिया विफलता है, लेकिन जो सबसे ज्यादा ताकतवर रहा है, वहीं पर खुफिया विफलता होती है। अमेरिका में 9/11 इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हमें मतभेद के बावजूद साथ रहना है। अब इस तरह की राजनीति नहीं चल पाएगी कि वोट के लिए अल्पसंख्यक कहीं बंटेंगे नहीं, उनका पूरा वोट मिलेगा और बहुसंख्यकों का 20 फीसदी भी हमारे साथ आ जाएगा, तभी हम सत्ता में रहेंगे।