तीन राज्यों में भाजपा ने क्या सोचकर नए चेहरों का चयन किया?
रामकृपाल सिंह: यह कोई नई बात नहीं है। जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तब पहला चुनाव महाराष्ट्र और हरियाणा में हुआ। उस वक्त देवेंद्र फडणवीस कहां चर्चा में थे? मनोहर लाल खट्टर कहां चर्चा में थे? इसके बाद योगी आदित्यनाथ, रामनाथ कोविंद, द्रोपदी मुर्मू जैसे कई नाम इस सूची में हैं। नामों के चयन के वक्त भाजपा यह देखती है कि जो व्यक्ति चुना गया है, उसकी ईमानदारी या सत्यनिष्ठा कितनी है? संगठन में पीढ़ीगत बदलाव चलता रहता है। भाजपा में यह एक तरह से पीढ़ीगत परिवर्तन की शुरुआत है। हम जब भी कोई बात करते हैं तो उसमें 2024 की ही बात आती है, लेकिन यह 24 साल बाद की रणनीति है। भाजपा की पूरी तैयारी 24 साल बाद यानी 2047 की है। यह एक लॉन्ग मार्च है। इसमें कई चेहरे जुड़ेंगे और कई चले जाएंगे।
क्या भाजपा अब पूरी तरह से कॉर्पोरेट मोड में आ गई है?
राखी बख्शी: एक तरफ यह राजनीतिक दूरदर्शिता का मामला है। दूसरी तरफ यह कॉर्पोरेट एलिजिबिलिटी का भी मामला है। जहां तक पीढ़ीगत बदलाव की बात है तो ये सभी चेहरे पार्टी में खामोशी से काम करने वाले कार्यकर्ता रहे हैं। ये सभी चेहरे संगठन में अपनी क्षमता दिखा चुके हैं। इसलिए मुझे लगता है कि प्रशासन में भी ये चेहरे काम आएंगे। यह नया जरूर है, लेकिन स्वागतयोग्य कदम है।
क्या भाजपा का यह कदम आगे की सोच के हिसाब से है?
प्रेम कुमार: नरेंद्र मोदी जब मुख्यमंत्री बने थे, तब वे 50-51 साल के थे। अब जो मुख्यमंत्री बनाए गए हैं। वो 58-59 साल के हैं। वहीं, शिवराज सिंह चौहान जब रिटायमेंट मोड में आ गए हैं, तब उनकी उम्र 64 साल है। वहीं, जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तब उनकी उम्र 64 साल थी। इसे भी देखना चाहिए। जब वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री बनती थीं तो सभी जातियों को साध रहीं थीं। वहीं, अब जो नेतृत्व आया है, उसमें सभी जातियां नहीं सधती दिख रही हैं। इससे तो यही कहा जा सकता है कि पहले जो नेतृत्व था, वह ज्यादा चीजों को साध रहा था।
पूर्णिमा त्रिपाठी: ये सभी चयन दिखा रहे हैं कि हर तबके को प्रतिनिधित्व मिला है। मुझे लगता है कि भाजपा ने एक साहसपूर्ण कदम उठाया है। पार्टी ने जो नए चेहरों को सामने लाने का काम किया है, उससे उसके कार्यकर्ताओं को नई ऊर्जा मिलेगी। इससे कांग्रेस को सबक लेना चाहिए कि हम कैसे नए पीढ़ी को आगे लाने का मौका दे सकते हैं। किसी भी पार्टी को आगे ले जाने के लिए सिर्फ एक नाम काफी नहीं होता है। उसके लिए कई चेहरों को जरूरत होती है। यह फैसला लॉन्गटर्म विजन है।
क्या यह भाजपा की स्टीरियोटाइप्ड तोड़ने की कोशिश है?
अवधेश कुमार: भाजपा में किसी चीज को तय करने की एक लंबी प्रक्रिया है। अगर हम यह मानकर चल रहे हैं कि केवल एक यो दो व्यक्तियों ने यह निर्णय ले लिया है तो यह गलत होगा। दूसरा अगर कोई व्यक्ति अच्छा काम कर रहा है और वह स्टीरियोटाइप है तो भी अच्छा है। जहां तक नरेंद्र मोदी की बात है तो 2024 में वह प्रधानमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार हैं। भाजपा का एक ठोस वोटबैंक बन चुका है। अब आवश्यकता यह है कि जिस आधार पर यह वोटबैंक बना है, उसे और सुदृढ़ करना है। हम सभी मानकर चलते हैं कि नरेंद्र मोदी का जो विजन है, उसके लिए हमें अभी से काम करना होगा। जिससे भाजपा को जैसे 2004 के बाद संकट देखना पड़ा, वैसा फिर नहीं हो। जिस तरह से राज्यों में सरकार के चेहरे बदले हैं। उसी तरह से केंद्र में भी कई चेहरों को बदले की जरूरत है। अलग-अलग संस्थानों में जो पांच-10 साल से बैठे हुए हैं, उन पर भी विचार करना होगा।
क्या यह भाजपा के हिंदुत्व की ओर बढ़ने की लाइन है?
समीर चौगांवकर: 1980 में जब भाजपा बनी, तब से लेकर अब तक हिंदुत्व भाजपा के कोर में रहा है। उससे भाजपा कभी नहीं हटी है चाहे वह सत्ता में रही हो या नहीं रही हो। 2014 के बाद भाजपा के संगठन में काफी बदलाव आया है। इसके साथ ही सरकार के स्तर पर भी प्रधानमंत्री ने कई प्रयोग किए हैं। कई बार ऐसा भी हुआ जब पार्टी को लगा कि प्रयोग सही नहीं रहा तो उसे बदलने में भी पार्टी ने समय नहीं लगाया। उत्तराखंड हो या गुजरात हो या फिर गोवा हो, ऐसे कई उदाहरण हैं। पार्टी ने बीते समय में कई साहसिक निर्णय लिए हैं। इस बार के फैसलों ने बताया कि अगर आप लंबे समय से एक पद पर हैं तो वहीं नहीं बने रहेंगे। आपको संगठन में भी जाना होगा। प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि भाजपा को अगर अगले 15-20 या 25 साल तक सत्ता में देखना है तो नए नेतृत्व को सामने लाना होगा। यह उसी दिशा में लिया गया निर्णय है।