हालांकि, राजभवन ने मंगलवार को कहा कि उसने विवादास्पद विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक सहित सात विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए सुरक्षित रखा है। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने 24 नवंबर को केरल सरकार की उस याचिका पर सुनवाई की थी, जिसमें राज्यपाल पर राज्य विधानसभा द्वारा पारित कई विधेयकों को मंजूरी न देने का आरोप लगाया गया था।
राजभवन से जारी विज्ञप्ति के मुताबिक, राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए सुरक्षित विधेयकों में दो विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक शामिल हैं। अन्य विधेयकों में लोकायुक्त विधेयक, विश्वविद्यालय विधेयक 2022 (राज्यपाल को कुलाधिपति का दर्जा वापस करने से संबंधित), विश्वविद्यालय खोज समिति के विस्तार से संबंधित विधेयक और सहकारी (मिल्मा) विधेयक शामिल हैं।
पिछले हफ्ते, उच्चतम न्यायालय ने पंजाब के मामले में अपने हालिया फैसले का जिक्र करते हुए केरल के राज्यपाल के अतिरिक्त मुख्य सचिव से कहा था कि राज्यपाल कानून बनाने की सामान्य प्रक्रिया को बाधित नहीं कर सकते हैं। राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित के खिलाफ पंजाब सरकार की याचिका पर फैसला सुनाते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था कि राज्यपाल बिना किसी कार्रवाई के विधेयकों को अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रख सकते।
फैसले में कहा गया कि अगर राज्यपाल किसी विधेयक मंजूरी न देने का फैसला करते हैं तो उन्हें विधेयक को पुनर्विचार के लिए विधायिका को लौटाना होगा। पीठ ने यह भी कहा कि अनिर्वाचित 'राज्य प्रमुख' को संवैधानिक शक्तियां सौंपी गई हैं, लेकिन इसका इस्तेमाल राज्य विधानसभाओं द्वारा कानून बनाने की सामान्य प्रक्रिया को बाधित करने के लिए नहीं किया जा सकता है।