पांचजन्य में इंफोसिस के खिलाफ प्रकाशित लेख से पैदा हुआ बवाल बढ़ता जा रहा है। संघ के प्रचार प्रमुख सुनील अंबेकर ने लेख को जहां लेखक की निजी राय बताकर किनारा किया था, वहीं संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी मनमोहन वैद्य ने उसे हवा दी है।
आरएसएस के मुख पत्र पांचजन्य में अग्रणी सॉफ्टेवयर कंपनी इंफोसिस के खिलाफ लेख प्रकाशित होने से पैदा हुआ विवाद थम नहीं रहा है। संघ के सह सर कार्यवाह मनमोहन वैद्य ने कहा है कि पांचजन्य धर्मयुद्ध लड़ रहा है। इससे पहले विवाद थामने के प्रयास में संघ के प्रचार प्रमुख सुनील अंबेकर ने इस विवाद से पांचजन्य को अलग किया था।
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श्रेष्ठ लोगों पर भी चलाना पड़ेंगे बाण
संघ समर्थित पत्रिका पांचजन्य के नए कार्यालय के उद्घाटन के मौके पर मनमोहन वैद्य ने सोमवार को एक कार्यक्रम में कहा कि 'आज भी राष्ट्रीय विचार को प्रभावी न होने देने के लिए कई तरह की शक्तियां सक्रिय हैं। लेकिन धीरे-धीरे उनकी शक्ति कम हो रही है। यह लड़ाई लंबी चलने वाली है। पांचजन्य उसका शंखनाद ही है। इस धर्मयुद्ध में ऐसे श्रेष्ठ लोगों पर भी बाण चलाना पड़ते हैं, जो गलत के साथ हैं।'
अंबेकर ने सफाई में यह कहा था
वैद्य के बयान के एक दिन पहले आरएसएस के प्रचार प्रमुख सुनील अंबेकर ने इंफोसिस विवाद को लेकर सफाई देते हुए कह दिया था कि पांचजन्य संघ का मुखपत्र नहीं है। इंफोसिस पर इसमें प्रकाशित लेख लेखक की व्यक्तिगत राय को दर्शाता है। एक भारतीय कंपनी के तौर पर इंफोसिस ने देश की प्रगति में अहम योगदान दिया है। अंबेकर ने यह भी कहा था कि पांचजन्य आरएसएस का मुखपत्र नहीं है। इसमें छपे लेख या राय को आरएसएस से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। इसके बाद वैद्य ने कहा, 'पांचजन्य धर्मयुद्ध का शंखनाद है।' उधर पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर ने कहा है कि पांचजन्य व आर्गनाइजर राष्ट्रहित के मुद्दे उठा रहे हैं और यही उनकी पहचान है।
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यह है पूरा विवाद
पांच सितंबर के अंक में पांचजन्य में एक लेख छपा था। इसमें आयकर पोर्टलों में आ रही परेशानियों को लेकर की ओर इशारा करते हुए इंफोसिस को निशाना बनाया गया था। इन पोर्टलों को इंफोसिस ने ही तैयार किया है। लेख में कहा गया था कि ऐसी घटनाओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था में करदाताओं के भरोसे को कम कर दिया है। यह पहली बार नहीं है जब इंफोसिस ने किसी सरकारी परियोजना के लिए ऐसा किया है। इस लेख में देश की अग्रणी आईटी कंपनी की मंशा पर भी सवाल उठाए गए हैं। कहा गया कि पहली बार हुई गलती को संयोग कहा जा सकता है। लेकिन, वही बार-बार हो तो संदेह पैदा होता है। लेख में आरोप लगाया गया कि कंपनी का प्रबंधन जानबूझकर भारतीय अर्थव्यवस्था को अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है। लेख में इंफोसिस पर नक्सलियों, वामपंथियों और टुकड़े-टुकड़े गिरोहों की मदद करने का आरोप भी लगाया गया।