साथ ही, दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस कामेश्वर राय और जस्टिस अमित बंसल की बेंच ने जून 2020 में 21 कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) की तरफ से कर्नल संदीप शर्मा दी गई 'नाराजगी' की प्रशासनिक सजा को भी रद्द कर दिया। कर्नल संदीप शर्मा को यह सजा आठ साल बाद दी गई थी।
होटल के झूठे बिल देने का लगाया आरोप
दरअसल 2012 में कर्नल संदीप शर्मा पर उनके एक अधीनस्थ अधिकारी ने उन पर होटल में ठहरने के लिए झूठे बिलों से संबंधित अनियमितताओं और 71 टास्क फोर्स (टीएफ) के सीओ रहते हुए रेलवे वारंटों के सही रिकॉर्ड नहीं रखने का आरोप लगाया था, जिसके चलते उनकी कमांड के दौरान बेहिसाब वारंट फॉर्मों का उपयोग किया गया था। कर्नल ने इस चूक के लिए 'नैतिक जिम्मेदारी' भी स्वीकार की थी।
आठ साल बाद जीओसी ने दिया कारण बताओ नोटिस
इस मामले में कर्नल शर्मा के खिलाफ कार्यवाही 2012 में शुरू हुई और जो जनवरी 2020 तक चलती रही। वहीं, उनके खिलाफ पहली बार आरोप लगाए जाने के आठ साल बाद 21 कोर जीओसी ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। कर्नल ने इसे चुनौती देते हुए आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की। एएफटी ने 10 महीने तक फैसला सुरक्षित रखने के बाद अप्रैल 2023 में उनकी याचिका को खारिज कर दिया।
यूएन में भी की सेवा
कर्नल शर्मा को 1994 में जम्मू और कश्मीर राइफल्स (जेक रिफ) में कमीशन मिला था। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई जगहों पर अपनी सेवाएं दीं, यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र मिशन में एक असाइनमेंट समेत कई चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं भी निभाईं। 2010 में उन्हें 3-जेक रिफ की कमान संभालनी थी, लेकिन वे ज्वाइन ही नहीं कर पाए, क्योंकि उन्हें लो मेडिकल कैटेगरी (एलएमसी) में रखा गया था। इसके बाद उन्हें 71 टास्क फोर्स (TF) स्पेशल यूनिट की कमान संभालने की जिम्मेदारी दी गई।
रेगुलर इंफैंट्री बटालियन की बजाय झांसी स्टेशन मुख्यालय भेजा
जबकि टीएफ यूनिट की कमान उन्हीं अफसरों की दी जाती है, जो रेगुलर यूनिट की कमान संभाल चुके हों। वहीं कर्नल शर्मा के मामले में, इस तथ्य के बावजूद वे लो मेडिकल कैटेगरी में हैं, और उन्हें एक रेगुलर इंफैंट्री बटालियन संभालनी थी, उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। इसके बाद, उन्हें अक्तूबर 2012 में आयोजित स्पेशल रिव्यू मेडिकल बोर्ड (SRMB) की तरफ से कमांड संभालने की मंजूरी दे दी गई। वहीं, 71 टास्क फोर्स की कमांड पूरी होने के बाद कर्नल शर्मा को रेगुलर इंफैंट्री बटालियन कमांड संभालने की बजाय झांसी के स्टेशन मुख्यालय में भेज दिया गया। वहीं, कर्नल शर्मा के खिलाफ कार्यवाही के चलते उन्हें बटालियन की कमांड नहीं दी गई, जो ब्रिगेडियर के पद पर प्रमोशन के लिए बेहद जरूरी है। जिसके चलते प्रमोशन के लिए चयन बोर्ड में उनके नाम पर विचार नहीं किया गया।
नहीं किया बिलों के रीइंबर्समेंट का दावा
दिल्ली हाईकोर्ट ने 28 मई को दिए गए फैसले में एएफटी के फैसले को पलटते हुए दी गई सजा को खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि अधिकारी ने अपने बचाव में कहा था कि वह उस होटल में रुका ही नहीं था, जिसके लिए उस पर झूठे दावे करने का आरोप लगाए जा रहे हैं और न ही उसने कभी बिलों की रीइंबर्समेंट के लिए कोई दावा किया था। अपने आदेश में बेंच ने लिखा, "याचिकाकर्ता के खिलाफ जो साबित हुआ है, वह यह है कि उसने ग्वालियर के होटल सुख सागर के गलत बिल पेश किए थे। लेकिन हमें लगता है कि याचिकाकर्ता का मामला यह है कि वह होटल शेल्टर, ग्वालियर में रुका था, जिसका होटल ने सर्टिफिकेट भी जारी किया है।"
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा, "होटल सुख सागर के बिल के आधार पर, याचिकाकर्ता की इन दलीलों पर विचार किए बिना कि (1) वह होटल सुख सागर में नहीं रुका था; (2) उसने न तो इसका कोई बिल पेश किया और न ही उस बिल के लिए कोई क्लेम लिया और (3) होटल सुख सागर के बिल पर उसके हस्ताक्षर नहीं हैं, प्रतिवादी यह नहीं मान सकते थे कि याचिकाकर्ता के खिलाफ उक्त आरोप सिद्ध हो गया और उन्होंने आदेश पारित कर दिया।"
कोर्ट ऑफ इंक्वायरी की कार्यवाही गैरकानूनी
इसके अलावा, दिल्ली हाईकोर्ट ने ये भी कहा कि कर्नल शर्मा के रेलवे वारंट के दुरुपयोग में कोई अनियमितता नहीं पाई गई और फिर भी उन्हें सिर्फ इसलिए दंडित किया गया, क्योंकि उन्होंने अपनी कमांड में हुई किसी भी घटना के लिए नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार की थी। अदालत ने यह भी पाया कि अफसर को सजा सुनाते समय सेना ने कोर्ट ऑफ इंक्वायरी की कार्यवाही पर भरोसा किया, जो कि अदालत द्वारा मान्य नहीं थी। क्योंकि कोर्ट सेना की कोर्ट ऑफ इंक्वायरी को बतौर ज्यूडिशियल रिकॉर्ड स्वीकार नहीं करता है। वह केवल अदालत में हुई कार्यवाही को ही ज्यूडिशियल रिकॉर्ड मानता है।
सेना प्रमुख पर छोड़ा फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सेना प्रमुख चाहें, तो प्रमोशन के लिए आयु में छूट दे सकते हैं और यदि छूट दी जाती है, तो याचिकाकर्ता के मामले पर ब्रिगेडियर के पद पर प्रमोशन के लिए उस तारीख से विचार किया जाएगा, जिस दिन उसे स्पेशल रिव्यू मेडिकल बोर्ड की तरफ से फिट घोषित किया गया था।