एक दशक की देरी के बाद, भारतीय कंटेनर निगम लिमिटेड (कॉनकॉर) के एक अधिकारी के खिलाफ जल्द ही भ्रष्टाचार के एक मामले की सुनवाई शुरू होगी। अधिकारियों ने बताया कि सीबीआई ने 2011 में दाखिल आरोप पत्र के सिलसिले में अदालत के समक्ष एक अहम फोरेंसिक रिपोर्ट सौंप दी है और मुकदमा चलाने की मंजूरी दिए जाने से अवगत करा दिया है।
कॉनकॉर के अधिकारी प्रियव्रत मित्रा के खिलाफ मामले में देरी के लिए मुख्य रूप से मुकदमा चलाने की मंजूरी मिलने को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था, लेकिन एक समीक्षा के दौरान, यह भी पता चला कि सीबीआई के एक अधिकारी ने 2012 में केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (सीएफएसएल) द्वारा पेश एक महत्वपूर्ण फोरेंसिक रिपोर्ट को दबा कर रखा था। उस दोषी अधिकारी के खिलाफ भी विभागीय कार्यवाही शुरू कर दी गई है। ऐसा लग रहा था कि 10 साल की देरी के चलते मामला आखिरकार बंद हो गया लेकिन जब एक विशेष अदालत ने शनिवार को आगे की कार्यवाही के लिए 14 अगस्त की तारीख तय की तो इस मामले में अब जल्द सुनवाई की उम्मीद जगी है। अधिकारियों ने बताया कि सीबीआई ने 2011 में मित्रा, भारत ऑयल कंपनी के तत्कालीन प्रबंध निदेशक नरेश मंगलानी और सीमा शुल्क विभाग के अधिकारियों समेत सात लोगों के खिलाफ निजी लाभ के लिए आधिकारिक पद के कथित दुरुपयोग के मामले में आरोप पत्र दाखिल किया था। मित्रा और अन्य अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन के लिए अनिवार्य मंजूरी रिपोर्ट एजेंसी ने आरोप पत्र के साथ दाखिल नहीं की थी, जिसके चलते अदालत ने 2012 में मामले को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया था।
आपराधिक साजिश कर तेल कंपनी को फायदा पहुंचाने का आरोप
आरोप है कि मित्रा ने सीमा शुल्क विभाग के अधिकारियों के साथ आपराधिक साजिश कर तेल कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए तुगलकाबाद के इन्लैंड कंटेनर डिपो में रखे कंटेनर में वजन में हेराफेरी की। कंपनी ने कथित साजिश के तहत 3.04 करोड़ रुपये के बिल जमा किए थे, जिन्हें सीबीआई द्वारा 2010 में सतर्कता विभाग के साथ संयुक्त औचक निरीक्षण के बाद रोक दिया गया था। सीबीआई द्वारा आरोपित सरकारी अधिकारियों के मामले में, संबंधित विभाग से अभियोजन की मंजूरी एजेंसी द्वारा अनिवार्य रूप से ली जानी होती है और उससे अदालत को अवगत कराना होता है। सीबीआई ने नौ साल के लंबे इंतजार के बाद, 26 अक्तूबर 2021 को मित्रा के खिलाफ अदालत में मुकदमा चलाने के लिए सरकार की मंजूरी के बारे में बताया और कहा कि सीमा शुल्क विभाग द्वारा अन्य आरोपियों अधीक्षकों ओम पाल सिंह और गगन गुप्ता और निरीक्षक परमजीत सिंह के मामले में इसे अस्वीकार कर दिया गया था।
कोर्ट ने अत्यधिक देरी पर एजेंसी से मांगा था स्पष्टीकरण
एजेंसी ने कहा कि मंजूरी देना या खारिज करना सरकार का विशेषाधिकार है। उसने कहा कि तीन सीमा शुल्क अधिकारियों के खिलाफ इसे अस्वीकार कर दिया गया है और इसलिए, उनके खिलाफ मामला आगे नहीं बढ़ेगा। अदालत ने इसे अत्यधिक विलंब करार देते हुए एजेंसी से सफाई मांगी थी कि एक दशक से रिपोर्ट क्यों नहीं दाखिल की गई। सीबीआई ने जांच की जिसमें पता चला कि पूर्व जांच अधिकारी डीएसपी सतेंद्र सिंह ने अपने उत्तराधिकारी को मामले का पूरा प्रभार नहीं सौंपा था। एजेंसी ने इस बारे में पता चलने के बाद सिंह के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की थी।