नाराजगी का जोखिम
दरअसल, मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भाजपा हाईकमान के लिए समस्या नहीं हैं। दिल्ली से सारी नियुक्तियां होती हैं। 'यस सर' के अनुसार, काम आगे बढ़ता रहता है। पार्टी नेतृत्व और संघ में उनके प्रति सॉफ्ट कार्नर है। किसान आंदोलन में जैसा केंद्र ने कहा, उन्होंने वैसा ही किया। अखिल भारतीय आदर्श जाट महासभा के अध्यक्ष दीपक राठी कहते हैं, पार्टी के पास अभी खट्टर का विकल्प नहीं है। किसान नेताओं की कमी के कारण प्रदेश के हर जिले में किसान आंदोलन शुरू नहीं हो सका। जहां पर भाजपा या जजपा के विधायक हैं, वहां उपवास कार्यक्रम तक आयोजित नहीं हो सके। किसान आंदोलन का नकारात्मक प्रभाव कितना पड़ता है, ये उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद ही मालूम हो सकेगा।
अगर मौजूदा राजनीतिक हालात में मुख्यमंत्री मनोहर लाल को बदलते हैं तो गैर-जाट नाराज हो जाएंगे। चूंकि भाजपा अपना कोर वोटर 'गैर जाटों' को बताती आई है, इसलिए वह ऐसा जोखिम मोल नहीं लेगी। जाटों और किसानों की पार्टी कही जाने वाली 'जजपा' खुद खट्टर सरकार में शामिल है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जाटों की संख्या करीब 20 से 25 फीसदी बताई गई है। राजनीतिक विश्लेषक रविंद्र कुमार सैनी कहते हैं, टाइमिंग को देखें। गुजरात और उत्तराखंड में अगले साल चुनाव हैं। हरियाणा में विधानसभा चुनाव 2024 में हैं। ऐसी संभावना है कि तब तक किसान आंदोलन को लेकर कोई सार्थक बातचीत हो जाएगी। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस, जिस तरह से जाट और गैर जाट को लेकर एक स्पष्ट नीति पर चलती आई है, वैसा ही भाजपा ने कर दिया है। कांग्रेस में जब भूपेंद्र हुड्डा सीएम थे तो प्रदेशाध्यक्ष गैर जाट को बना दिया जाता था। आज भी हुड्डा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं तो कुमारी शैलजा पार्टी की प्रदेशाध्यक्ष हैं। इसी तर्ज पर भाजपा में खट्टर 'गैर जाट' सीएम हैं तो 'जाट' ओपी धनखड़ प्रदेशाध्यक्ष हैं। प्रदेश में जाट, गुर्जर और अहीर, एक खास पॉकेट में रहे हैं। यह तय है कि प्रदेश में अगर किसान आंदोलन खत्म हो जाता है तो मनोहर लाल खट्टर सरकार को लेकर लगाई जा रही कई अटकलें थम जाएंगी।