केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि घर खरीदारों और प्रमोटरों के अधिकारों और हितों को संतुलित करने के लिए रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम के प्रावधानों के तहत पहले से ही एक मजबूत नियामक तंत्र और एग्रीमेंट फ़ॉर सेल' का मसौदा है ताकि जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके और पारदर्शिता रहे।
सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर केंद्र ने रेरा की धारा-13 का हवाला देते हुए कहा कि यह विशेष रूप से 'एग्रीमेंट फ़ॉर सेल'' से निपटता है और बगैर 'एग्रीमेंट फ़ॉर सेल' के प्रमोटर को खरीदारों से कोई जमा या अग्रिम स्वीकार करने से प्रतिबंधित करता है। केंद्र सरकार ने आगे कहा कि रेरा लागू होने के बाद 2016 में उसने सभी राज्यों और केंद्र शासिप्रदेशों के साथ 'एग्रीमेंट फ़ॉर सेल' का मसौदा साझा किया था। वर्तमान में नागालैंड को छोड़कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने रेरा के तहत नियमों को अधिसूचित कर लिया है।
केंद्र ने कहा कि उसने अधिनियम बनाकर रेरा के प्रावधानों को बेहतर ढंग से लागू करने के लिए नियम बनाने की जिम्मेदारी राज्यों को सौंपकर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया है।
आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय की यह प्रतिक्रिया वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की एक जनहित याचिका पर आई है जिसमें रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता और निष्पक्षता को बढ़ावा देने के लिए 'मॉडल बिल्डर बायर एग्रीमेंट' बनाने की मांग की गई है। अपने जवाब में केंद्र सरकार ने कहा कि याचिका का कोई मतलब नहीं है क्योंकि एक मजबूत नियामक तंत्र मौजूद है और रेरा के प्रावधानों के तहत 'एग्रीमेंट फ़ॉर सेल' का मसौदा पहले ही निर्धारित किया जा चुका है। केंद्र ने कहा है रेरा के तहत राज्य पर निहित शक्तियों में हस्तक्षेप अतिरेक होगा और अधिनियम के उद्देश्य को परास्त करेगा।
उपाध्याय ने अपनी याचिका में कहा है कि 'मॉडल बिल्डर बायर एग्रीमेंट से रियल इस्टेट में पारदर्शिता आएगी और फ्लैट खरीदारों को धोखाधड़ी का सामना नहीं करना पड़ेगा। वर्तमान में रियल इस्टेट के तमाम अग्रीमेंट एकतरफा और मनमाने होते हैं। यह अग्रीमेंट फ्लैट खरीदारों के लिए हितों को नजरअंदाज करने वाले हैं। रेरा एक्ट,2016 और संविधान के अनुच्छेद- 14, 15 और 21 के मद्देनजर उपभोक्ताओं को संरक्षण दिया जाना चाहिए। याचिका में यह भी कहा गया है कि सभी राज्यों को 'मॉडल बिल्डर बायर अग्रीमेंट' और 'मॉडल एजेंट बायर अग्रीमेंट' को लागू करने का निर्देश दिया जाए जिससे कि उपभोक्ताओं को होने वाली मानसिक व वित्तीय परेशानी को दूर किया जा सके।