फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Global Economic Crisis: क्या भारत में चुपचाप पांव पसार रही है वैश्विक आर्थिक मंदी?, सामान्य खाने-पीने की चीजें जीएसटी के दायरे में

सार

अमेरिका ने अपने ब्याज दरों में परिवर्तन किया। अमेरिका की अर्थव्यव्यस्था को स्थायी और मजबूत माना जाता है। दुनिया के देशों के केन्द्रीय बैंकों ने इकोनामिक प्रोटेक्शनिज्म को ध्यान में रखकर नीतियों, ब्याद दरों में बदलाव शुरू किए हैं। इसके असर से भारत में निवेश करने वाले अंतरराष्ट्रीय निवेशकों नें अपनी पूंजी निकालनी शुरू की।
विज्ञापन
भारतीय अर्थव्यवस्था (सांकेतिक तस्वीर)। - फोटो : pixabay
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

क्या वैश्विक आर्थिक मंदी चुपचाप अपने पांव पसार रही है? भारत के कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि दीपावली के बाद देश में आर्थिक मंदी का असर देखने को मिल सकता है। अर्थशास्त्री और प्राक्टर एंड गैंबेल के पूर्व सीईओ और प्रबंध निदेशक (स्ट्रेटजिक) गुरुचरण दास का कहना है कि पूरी दुनिया में आर्थिक उथल-पुथल मची है।

विज्ञापन


सारथी आचार्य के मुताबिक, वैश्विक आर्थिक मंदी के संकेत दिखाई देने लगे हैं और भारत इससे अछूता नहीं रहेगा। दोनों अर्थशास्त्री वैश्विक और घरेलू आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए केन्द्र सरकार के हाल के फैसलों की आलोचना करते हुए कहते हैं कि खाने-पीने और सामान्य जरूरत की चीजों पर इस तरह गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) लगाना जख्म पर नमक मलने जैसा ही है।

पूर्व केन्द्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम केन्द्र सरकार की नीतियों के अच्छे आलोचकों में हैं। उनसे बात कीजिए तो साफ कहते हैं कि एक तरफ लोगों की चुनौतियां बढ़ रही हैं और दूसरी तरफ सरकार बिल्कुल असंवेदनशील बनी हुई है। चिदंबरम के मुताबिक सरकार और इसके रणनीतिकारों के पास भारतीय अर्थव्यवस्था के आधारभूत संरचना की समझ ही नहीं है। जबकि कांग्रेस के सांसद राहुल गांधी केन्द्र की सरकार को कुछ उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने वाली सरकार बताते हैं। कुल मिलाकर मुख्य विपक्षी पार्टी का कहना है कि मोदी सरकार ने इस देश की संस्थाओं और आर्थिक संस्थानों को अपनी गलत नीतियों के चलते संकट में डाल दिया है। इसका खामियाजा देश के लोगों को भुगतना पड़ रहा है।
विज्ञापन


क्या हैं आर्थिक मंदी के लक्षण?
अमेरिका ने अपने ब्याज दरों में परिवर्तन किया। अमेरिका की अर्थव्यव्यस्था को स्थायी और मजबूत माना जाता है। दुनिया के देशों के केन्द्रीय बैंकों ने इकोनामिक प्रोटेक्शनिज्म को ध्यान में रखकर नीतियों, ब्याद दरों में बदलाव शुरू किए हैं। इसके असर से भारत में निवेश करने वाले अंतरराष्ट्रीय निवेशकों नें अपनी पूंजी निकालनी शुरू की।

नतीजतन भारतीय शेयर बाजार में 9 प्रतिशत से अधिक की गिरावट देखी गई। प्रति डालर भारतीय मुद्रा 80 रुपये के आंकड़े को पार कर गई। अमेरिका, ब्रिटेन में मंहगाई दर ऐतिहासिक स्तर 9.1 प्रतिशत की है। जबकि यूरोपीय यूनियन में यह 7.6 प्रतिशत पर चल रही है। चीन की आर्थिक दर 2.5 प्रतिशत की चल रही है और उसने अपने सकल घरेलू उत्पाद दर को 5.5 प्रतिशत पर रहने का अनुमान व्यक्त किया है। जो पिछले कुछ दशकों में काफी है। पूरी दुनिया में बेरोजगारों की संख्या 20-25 करोड़ होने का अनुमान है। इसके सामानांतर भारत में भी बेरोजगारी दर अभूतपूर्व स्तर पर आ चुकी है। कच्चे तेल के दामों में अभी अस्थिरता बनी हुई है। हाल में दाम कुछ घटे हैं लेकिन जल्द इसके फिर बढऩे के संकेत हैं। पूरी दुनिया में मांग और आपूर्ति की चेन को गहरा झटका लगा है। गुरुचरण दास इस स्थिति को चुनौतीपूर्ण मानते हैं।

भारत में भी लग गया है मंहगाई का तड़का
गुरुचरण दास भी मानते हैं कि केन्द्र सरकार ने गलत समय पर गलत फैसला ले लिया। इसे आटा, दाल, चावल आदि को अभी जीएसटी के दायरे में नहीं लाना चाहिए था। इससे महंगाई बढ़ेगी। दास कहते हैं कि अभी जनता वैसे ही महंगाई की मार से त्रस्त है। दुनिया के केन्द्रीय बैंकों ने वैश्विक आर्थिक मंदी के संकेतों को भांपते हुए कड़े फैसले लेने शुरू किए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने कड़ा फैसला लेते हुए ब्याज दरों में वृद्धि की घोषणा की है। गुरुचरण दास का कहना है कि इसे आप अच्छा भी कह सकते हैं और खराब भी। इसका असर यह होगा कि जो लोग बैंक से ऋण लेकर कारोबार कर रहे हैं, उन्हें मंहगी दर पर पैसा मिलेगा। इसके कारण वह बैंक से ऋण लेकर कारोबार बढ़ाने की तरफ कम सोचेंगे। इससे रोजगार के अवसरों के बढ़ने की संभावना कम होगी। इसका असर मंहगाई पर भी पड़ सकता है। गुरुचरण दास कहते हैं कि कुछ समय पहले तक मंहगाई दर काफी थी। तेल के दाम भी बढ़े हुए थे। तेल का दाम कम होने से लोगों को राहत मिल रही थी, लेकिन जीएसटी में बढ़ोत्तरी, रसोई गैस के दाम बढ़ने, आरबीआई की ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी  के बाद फिर लोगों पर इसका असर पड़ेगा।
 
दुनिया के कई देशों के लिए है बुरी खबर, भारत भी बहुत सेफ जोन में नहीं
पड़ोसी देश श्रीलंका की खराब माली हालत ने वहां सबकुछ अस्त व्यस्त कर रखा है। पड़ोसी देश म्यांमार भी कठिन चुनौती से जूझने के कगार पर है। पाकिस्तान की आर्थिक हालत कमजोर चल रही है। इन सबकी तुलना में भारत बहुत सेफ जोन में नहीं है। ज्योति कपूर गिफ्ट के सामानों की दुकान चलाती हैं। साफ कहती हैं कि 2019 की तुलना में कारोबार अभी भी 40-45 प्रतिशत नीचे है। आरके सिंघल का होजरी का कारोबार है। बताते हैं कि बाजार में पहले की तुलना में मांग काफी कम है। भारत के 23 स्टार्ट अप ने 10 हजार के करीब युवाओं की छंटनी कर दी। शिवम बत्रा कंपनियों को प्रोफेशनल्स की आपूर्ति करते हैं। बत्रा बताते हैं कि 2019-20 में प्रोफेशनल्स की जितनी मांग थी, उसकी तुलना में अभी 30 प्रतिशत के करीब ही रोजगार के अवसर निकल पा रहे हैं।

अब दुनिया की कुछ बड़ी कंपनियों की तरफ चलते हैं। गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने साफ कहा है कि 2022-23 में महत्वपूर्ण पदों पर इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञों की ही भर्ती की जाएगी। फेसबुक ने भी अपनी भर्ती प्रक्रिया में 30 प्रतिशत तक की कटौती लाने की घोषणा की है। माइक्रोसाफ्ट के भी सुर इसी तरह के हैं। आईबीएम के आईटी प्रोफेशनल राजेश चौधरी बताते हैं कि रोजगार के क्षेत्र में अब पहले वाली बात नहीं रही है। अवसर घटे हैं, मुकाबला कड़ा हुआ है।

आखिर आर्थिक मंदी है क्या?
जब अंतरराष्ट्रीय वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में लगातार गिरावट हो रही हो और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर में कम से कम तीन महीने लगातार कमी देखने में आ रही हो तो इसे आर्थिक मंदी कहा जाता है। आर्थिक मंदी के पहले व्यापारिक मंदी के संकेत मिलते हैं। व्यापारिक मंदी का आशय एक निरंतर समय में सामान्य आर्थिक गतिविधियों में कमी आने या व्यापार में संकुचन देखने को मिलता है। भारतीय घरेलू व्यापारिक प्रणाली पर काम करने वाले आरके शर्मा कहते हैं कि कोरोना और लॉकडाउन के बाद से मांग और आपूर्ति का जो क्रम टूटा, वह अभी तक बहाल नहीं हो पाया है। आप कह लीजिए कि बाजार की कमर अभी तक सीधी नहीं हो पाई है। रीयल स्टेट के कारोबारी दिनेश खेतान के मुताबिक दिल्ली एनसीआर से लेकर पूरे देश में प्रापर्टी के बाजार में 20-35 प्रतिशत तक गिरावट है। अभी यह जारी है। खेतान कहते हैं कि बैंकों की प्रापर्टी की नीलामी दर में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। यह साफ संकेत है कि लोग अपनी आर्थिक जिम्मेदारियों को लेकर जूझ रहे हैं। भारत ज्वेलर्स के अश्विनी बग्गा कहते हैं कि आप इसे चाहे कारोबारी मंदी कह लें या व्यापारिक मंदी, मेरे मुताबिक बाजार में पहले जैसा कामकाज नहीं आ पा रहा है। हां, चीजें पहले से जरूर मंहगी होती जा रही हैं। इसके कारण ग्राहक भी बाजार में कम खरीददारी कर रहा है।

क्यों बढ़ रही है महंगाई, भारत में इसके क्या कारण हैं?
पूर्व बैंकिंग सेक्रेटरी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि हमें जो काम जब नहीं करना चाहिए, हम उसे उसी समय कर देते हैं। जैसे जीएसटी को जल्दबाजी में लागू किया और आज तक तय नहीं कर पा रहे हैं कि किस वस्तु की जीएसटी कितनी हो? बैंकों का विलय किया जाना है, अच्छी बात है। लेकिन क्या जरूरी है कि जब नोटबंदी और सरकार की कुछ नीतियों के कारण वित्तीय संस्थाएं और बैंक दबाव में चल रहे हों, तभी उनका विलय कार्यक्रम बढ़े? पूर्व सचिव के मुताबिक पिछले कुछ सालों में कई चकित करने वाले घटनाक्रम देखने को मिले। हमने लिखित बोर्ड देखा कि बैंकों में कैश नहीं है। एटीएम में पैसे नहीं है। बैंक और वित्त संस्थाएं दिवालिया हो रही हैं। यह सब कोई अच्छा संकेत नहीं था? इसी तरह से देश महंगाई, बेरोजगारी से जूझ रहा है, लोग लिए गए कर्ज को नहीं चुका पा रहे हैं और ऐसे समय में भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी का फैसला लिया। सरकार ने आटा, दाल, चावल जैसी जरूरी चीजों पर पांच फीसदी जीएसटी लगाने की घोषणा कर दी है। सूत्र का कहना है कि यह तो वही हाल हुआ कि एक तरफ जनता मंहगाई की जलन से कराह रही है और ऊपर से उसके घाव पर नमक रगड़े जा रहे हैं।
 
सूत्र का कहना है कि कोरोना महामारी के बाद दुनिया की अर्थव्यवस्था तमाम दुश्वारियों से जूझ रही है। हम भी उससे बाहर आने में लगे थे। इसी संकट के समय रूस और यूक्रेन के युद्ध ने इसकी समस्या को कई गुणा बढ़ा दिया है। पूर्व सचिव का कहना है कि अभी तो लग रहा है कि आने वाले समय में इसका और अधिक असर आएगा।

भारत पर कितना असर पड़ेगा?
सारथी आचार्य और गुरुचरण दास दोनों का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा। सारथी कहते हैं कि भारत में 45 प्रतिशत तक आटोमोटिव (आटोमोबाइल हब) का बोलबाला रहता है। भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया से जुड़ चुकी है। इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था पर उसी अनुपात में असर पड़ेगा। आटोमोबाइल, इलेक्ट्रानिक गुड्स और उपकरण समेत आयात-निर्यात प्रभावित होगा। वैसे भी अभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग और आपूर्ति की चेन तारतम्यता नहीं बना पाई है। इसके सामानांतर गुरुचरण दास कहते हैं कि वैश्विक आर्थिक मंदी का भारत पर असर पड़ेगा, लेकिन दुनिया के देशों के मुकाबले कम होगा। वह कहते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है। खाने-पीने की चीजों पर दुनिया के देशों के मुकाबले हमारी निर्भरता ज्यादा कृषि पर ही है। इसलिए भारत को तुलनात्मक रूप से समस्या कम आएगी।

पूर्व बैंकिग सचिव का वैश्विक आर्थिक मंदी के सवाल पर कहना है कि दक्षिण एशिया में भारत सबसे मजबूत अर्थव्यस्था है। हमपर वैश्विक आर्थिक मंदी का अपने आस-पास के देशों की तुलना में कम असर पड़ेगा। लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था के तमाम पहलू वैश्विक अर्थव्यवस्था के संकेतों पर निर्भर करते हैं। भारत बड़े पैमाने पर आयात करता है। इसलिए डालर की कीमत बढऩे, रुपये के कमजोर होने की हमें कीमत चुकानी पड़ेगी। अभी जिस तरह से हमारी वस्तुओं की अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग कम हुई है, यह स्थिति बनी रही तो इसका भी दंश झेलना पड़ेगा। हां, निर्यातकों को जरूर फायदा होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें