उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने गुरुवार को अहम बात कही। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी भारत की एक ऐसी पूंजी है जिस पर न तो कोई मोलभाव किया जा सकता है और न ही इस पर समझौता किया जा सकता है। इससे किसी भी प्रकार की छेड़खानी देश की संप्रभुता और समानता के साथ समझौता करने के समान होगा।
एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि देश में छद्म बुद्धिजीवियों की संख्या बढ़ रही है। इसे कम करने की आवश्यकता है। धनखड़ ने कहा कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी से कभी समझौता नहीं कर सकते हैं। अगर हम इससे कभी हटते हैं तो हमें अपने देश की संप्रभुता एवं समानता के साथ समझौता करना होगा।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र में कानून की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आजकल विधानसभा के बजाय सड़कों पर मुद्दों की चर्चा होती है। यह काफी निराशाजनक है। उन्होंने कहा कि चिंता का एक विषय है जिसे दूर करने की जरूरत है और वह है छद्म बुद्धिजीवी। क्या इस श्रेणी के लोगों को सार्वजनिक स्थान पर हावी होने दिया जा सकता है?
भारत एक सभ्यतागत लोकतंत्र: हिमंत
कार्यक्रम में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने दावा किया कि भारत संवैधानिक लोकतंत्र नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत लोकतंत्र है। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता पर वामपंथियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों के हमले के खिलाफ जवाब दिए जाने की जरूरत है। यह जवाब सामूहिक रूप से होना चाहिए। सरमा ने कहा कि हमारी सभ्यता के प्रति चुनौतियों के लिए हमें उन्हें यह समझाना होगा कि भारत 1947 में अस्तित्व में आई एक भौगोलिक इकाई नहीं है।