दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन के चलते लगाए गए मोर्चे उठाने के लिए किसान संगठन राजी हो गए हैं। केंद्र सरकार ने गुरुवार को संयुक्त किसान मोर्चे 'एसकेएम' को पत्र लिखकर उनकी अधिकांश मांगों पर अपनी सहमति दे दी है। इससे पहले सरकार और किसानों के मध्य सहमति नहीं बनने की एक बड़ी वजह, किसान आंदोलन के दौरान दर्ज हुए पुलिस केसों की वापसी रही है।
आंदोलन में शामिल किसान संगठन जानते थे कि यही एक बात ऐसी है जो 'जीती हुई बाजी' को हार में बदल सकती है। अगर किसानों पर दर्ज पुलिस केस वापस नहीं होते और आंदोलन खत्म हो जाता तो बड़ी मुश्किल पैदा हो सकती थी। इस मुद्दे पर हरियाणा, पंजाब और यूपी के किसान संगठनों के बीच काफी तर्क वितर्क हुआ था।
बाद में इन सबके बीच यह सहमति बनी कि जब तक केंद्र सरकार, आंदोलन के दौरान दर्ज पुलिस केस वापस लेने की घोषणा नहीं करती, तब तक मोर्चा नहीं हटाया जाएगा। पूर्व पुलिस अफसरों का कहना है कि किसी भी आंदोलन में दर्ज हुए केस, संबंधित सरकार के लिए 'चाबी' की तरह होते हैं। सरकार चाहे तो ये केस एक सप्ताह में खत्म हो सकते हैं। अगर सरकार की इच्छाशक्ति नहीं है तो इस तरह के पुलिस केस वर्षों तक चलते रहते हैं। खासतौर पर 302 और 307 जैसे गंभीर अपराध वाले केसों में तो सजा भी ज्यादा होती है।
दिल्ली पुलिस के पूर्व डीसीपी एलएन राव, जो स्पेशल सेल जैसी महत्वपूर्ण इकाई में 14 साल तक तैनात रहे हैं, का कहना है कि इस तरह के आंदोलनों में दर्ज हुए केस सप्ताह से पहले भी खत्म हो सकते हैं। ये सब, सरकार की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है। सरकार, केस वापसी का ग्राउंड तैयार करती है। उसके बाद वह फाइल एलजी के पास जाती है। जैसे ही एलजी उस फाइल पर साइन करते हैं, आंदोलन में दर्ज हुए केस वापस हो जाते हैं। यानी केस रद्द कर दिए जाते हैं। हर राज्य में यही प्रक्रिया होती है। दिल्ली से बाहर का केस है तो उस मामले में राज्यपाल के पास फाइल भेजी जाती है। हालांकि केस वापसी की अंतिम प्रक्रिया अदालत में पूरी होती है। सरकार ने केस वापस ले लिए हैं, इस बाबत अदालत में रिपोर्ट जमा करानी पड़ती है।
दिल्ली पुलिस के पूर्व एसीपी केजी त्यागी का कहना है, किसान आंदोलन में 99 फीसदी केस कोर्ट की सहमति से वापस हो सकते हैं। इस तरह के केसों में शिकायतकर्ता, पुलिस होती है। जब केस वापसी की सहमति बनती है तो राज्य सरकार, कोर्ट में आवेदन देती है। कुछ मामलों में केस उठाने के लिए दो तीन माह का समय लग सकता है। अगर 302 और 307 जैसे गंभीर अपराध के मामले यदि अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज हैं तो वे जल्द ही खत्म हो सकते हैं। सरकार, अदालत को लिखित में दे सकती है कि ये केस वापस लिए जाते हैं। कई मामलों में एफआर रिपोर्ट लगानी पड़ती है कि फलां केस में पर्याप्त सबूत नहीं मिला।
केंद्र सरकार ने किसानों को भेजे अपने पत्र में कहा है, जहां तक किसान आंदोलन में दर्ज हुए केसों का सवाल है तो उस बाबत यूपी, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश और हरियाणा सरकार ने इसके लिए पूर्ण सहमति दे दी है कि तत्काल प्रभाव से आंदोलन संबंधित सभी केसों को वापस ले लिया जाएगा। किसान आंदोलन के दौरान भारत सरकार के संबंधित विभाग, एजेंसियों तथा दिल्ली सहित सभी संघ शासित क्षेत्र में आंदोलनकारियों और समर्थकों पर बनाए गए आंदोलन संबंधित केस भी तत्काल प्रभाव से वापस लेने की सहमति है। भारत सरकार अन्य राज्यों से अपील करेगी कि इस किसान आंदोलन से संबंधित केसों को अन्य राज्य भी वापस लेने की कार्रवाई करें।