केद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने गुरुवार को विपक्ष से अल्पसंख्यकों के लिए समान अवसरों की कथित कमी पर मुस्लिम समुदाय के बीच भय पैदा न करने को कहा। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार नागरिकों के बीच भेदभाव नहीं करती है। लोकसभा में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के लिए अनुदान की मांगों पर चर्चा का जवाब देते हुए प्रधान ने यह भी कहा कि सरकार ने किसी पर कोई भाषा नहीं थोपी है।
शिक्षा के क्षेत्र में मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों को समान अवसर न दिए जाने के आरोपों के जवाब में मंत्री ने आंकड़े साझा करते हुए कहा, "मुसलमानों में डर मत फैलाइए। यह ज्यादा देर तक नहीं चलेगा।" प्रधान ने का कि कक्षा पांच से छह तक मुस्लिम छात्रों का अनुपात 89.2 है, जो राष्ट्रीय औसत 93.2 के करीब है।
उन्होंने कहा कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय 1875 में स्थापित किया गया था और इतने वर्षों में किसी महिला कुलपति की नियुक्ति नहीं की गई। हमारे कार्यकाल के दौरान ऐसा हुआ कि उसी विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली एक महिला प्रोफेसर को योग्यता के आधार पर कुलपति नियुक्त किया गया।
उन्होंने कहा, वे कहते हैं कि आप आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) से जुड़े लोगों को नियुक्त करते हैं। ऐसा नहीं है। वह आरएसएस जुड़ी नहीं हैं। अगर एक मुस्लिम महिला योग्यता के आधार पर प्रगति करती है, तो हमें गर्व होना चाहिए। उन्होंने कहा, हम (सरकार) भेदभाव नहीं करते यह सिर्फ आपका दृष्टिकोण है। आपकी राय है। आपके पास डर का माहौल बनाने का एजेंडा हो सकता है। लेकिन यह लंबे समय तक काम करने वाला नहीं है।
मंत्री ने कहा कि योग्यता पर आधारित शिक्षा को प्रोत्साहित करने की जरूरत है और नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 उस दिशा में एक कदम है। उन्होंने कहा, एनईपी सिर्फ 60 पन्नों का नीतिगत दस्तावेज नहीं है। यह भारत के पुनर्निर्माण करने, भाईचारे को बढ़ाने और दुनिया की सभी समस्याओं को हल करने के लिए एक दार्शनिक तत्व है। देश आज इसे सर्वसम्मति से स्वीकार करता है।