अमर उजाला से बातचीत करते हुए अतुल अंजान बताते हैं कि उन्होंने सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से अनौपचारिक तौर पर बात की है, लेकिन अभी तक कोई ठोस संकेत नहीं मिले हैं। दरअसल अखिलेश यादव जिस तरह अपने साथ राष्ट्रीय लोकदल, महान दल, भीम पार्टी आदि से बात कर रहे हैं और गठबंधन में लाने की कोशिश कर रहे हैं, उससे ये तो तय ही है कि एक बड़ा विकल्प आकार ले रहा है और मौजूदा समय में अखिलेश यादव ही योगी और भाजपा के सबसे मजबूत विकल्प हैं। प्रदेश को योगी राज से मुक्ति दिलाने के लिए जरूरी है कि इस गठबंधन को मजबूत किया जाए।
इन्हीं तमाम सवालों पर मंथन करने और चुनावी रणनीति तय करने के लिए 25 जून को वामपंथी पार्टियों की बैठक भी होने जा रही है, जिसमें सपा के साथ तालमेल और एक बड़े गठबंधन को आकार देने पर चर्चा होगी। एक तरफ भाजपा के भीतरी असंतोष और योगी के खिलाफ पार्टी में ही उठने वाली आवाज़ को दबाने की संघ के नेताओं की ओर से कोशिश हो रही है वहीं विपक्षी गठबंधन भी तेजी से मजबूत बनाने की कवायद चल रही है।
अंजान का कहना है कि सीपीआई प्रदेश की 74 से 100 सीटों पर अपनी दखल रखती है। पिछले चुनाव के नतीजे देखें तो साफ है कि इन इलाकों में हमारे कम से कम चार हजार से 18-20 हजार वोट तक हैं और इतने वोट किसी भी चुनाव नतीजे में निर्णायक होते हैं। कहीं हम दूसरे नंबर पर रहे तो कहीं तीसरे और चौथे नंबर पर। ऐसे में अगर गठबंधन में हमें कुछ चुनी हुई सीटें मिलें, तो हम जीत भी सकते हैं और अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में सहयोगियों को जितवा भी सकते हैं। अखिलेश यादव जिस तरह दूसरे क्षेत्रीय दलों के साथ बात कर रहे हैं, वामपंथियों के साथ भी कर सकते हैं। अतुल अंजान का मानना है कि किसी भी पार्टी को छोटा नहीं समझना चाहिए और उसकी अहमियत को कम करके नहीं आंकना चाहिए। चुनावी राजनीति में एक-एक वोट के मायने होते हैं।
अंजान का दावा है कि उत्तर प्रदेश में भी अगर दक्षिण भारतीय राज्यों की तरह और खासकर तमिलनाडु की तरह गठबंधन की राजनीति हो और सीटों का उचित बंटवारा हो तो भाजपा को हराना कोई मुश्किल काम नहीं है। हाल के पंचायत चुनाव के नतीजों से ये बात साफ हो चुकी है कि प्रदेश की जनता अब भाजपा से ऊब चुकी है। कोरोना काल में सरकार की नाकामी और खस्ता कानून व्यवस्था के अलावा धर्म और संकीर्ण सोच की राजनीति से लोग परेशान हैं। ऐसे में एक बड़े और असरदार गठबंधन की ज़मीन पूरी तरह तैयार है।
अतुल अंजान का मानना है कि बहुजन समाज पार्टी पर भरोसा नहीं किया जा सकता और वह ऐसे किसी गठबंधन में शामिल होगी, इसमें संदेह है। बुआ-भतीजे के गठबंधन का नतीजा पिछले चुनाव में देखा जा चुका है। वैसे भी मायावती अपने फायदे के लिए भाजपा के साथ चली जाएं तो इसमें संदेह नहीं। कांग्रेस की ज़मीनी हालत सबके सामने हैं। इसलिए सपा ही एकमात्र विकल्प है, साथ ही वो तमाम छोटे दल जो किसी न किसी रूप में अलग अलग क्षेत्रों में मजबूत हैसियत रखते हैं।