वैज्ञानिक का दावा है कि इस तकनीक से सामान्य गायों से ऐसी उन्नत किस्म की बछिया पैदा की जा सकती हैं, जो प्रतिदिन 30 से 40 लीटर तक दूध दे सकती हैं। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और देश में दूध की भारी कमी को भी पूरा किया जा सकेगा। इस तकनीकी की खासियत यह भी है कि इसके जरिये 90 फीसदी बछिया ही पैदा होती हैं, जो दूध देने के काम आती हैं। इस विधि में बछड़े बहुत कम पैदा होते हैं, जिनकी उपयोगिता आज के समय में लगातार घटती जा रही है और कई राज्यों में प्रशासन के लिए ये एक बड़ी समस्या बन चुके हैं। उत्तर प्रदेश में खुले बछड़ों के कारण भारी मात्रा में खेती की फसल बर्बाद हो रही है। इस तकनीक को अपनाने से इस समस्या से भी निजात मिल सकती है।
जेके बोवाजेनिक्स के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर श्याम जवर ने अमर उजाला को बताया कि इस प्रक्रिया में एक ‘दाता गाय’ (Donor) होती है, जो 30 से 40 लीटर प्रतिदिन दूध देने की क्षमता रखती है। इस गाय के अंडों को निकालकर उच्च कोटि की नस्ल के सांड के ‘सोर्टिंग’ प्रक्रिया से अलग किये हुए वीर्य के जरिये निषेचित कराया जाता है। यह निषेचन की प्रक्रिया प्रयोगशाला के एक विशेष पात्र में कराई जाती है। इसका तापमान और वातावरण उसी प्रकार का रखा जाता है जैसे कि एक मादा गाय के शरीर के अंदर गर्भ में होता है।
इस प्रकार एक निश्चित अवधि (लगभग सात से 15 दिन के बीच) तक भ्रूण को प्रयोगशाला में विकसित होने दिया जाता है। इसके बाद इसे विशेष विधि से पालक गाय (Foster या Receiver Mother) के गर्भाशय में ट्रांसफर कर दिया जाता है। इसके बाद सामान्य अवधि के बाद बछिया का जन्म होता है जो उच्च नस्ल की गाय होती है। यह दाता गाय की तरह 30 से 40 लीटर दूध देने की क्षमता वाली होती है। इससे जन्मे बच्चे भी इसी की तरह उच्च दुग्ध उत्पादन क्षमता वाले होते हैं।
नर के वीर्य में X और Y क्रोमोसोम्स होते हैं, जबकि मादा में केवल X क्रोमोसोम्स होते हैं। निषेचन की प्रक्रिया के दौरान जब नर के X कोमोसोम्स मादा के X क्रोमोसोम्स से मिलते हैं तब मादा बच्चे का जन्म होता है, जबकि नर के Y क्रोमोसोम्स के मादा के X क्रोमोसोम्स से मिलने के बाद नर बच्चे का जन्म होता है। सोर्टिंग एक वैज्ञानिक पद्धति का नाम है। इसके अंतर्गत नर के वीर्य से Y क्रोमोसोम्स को कम या खत्म कर दिया जाता है। इससे नर के वीर्य में केवल X क्रोमोसोम्स बचते हैं। इस अलग किए हुए या सोर्टेड वीर्य से गाय के अंडों को निषेचित कराया जाता है, जिससे केवल मादा बच्चे का ही जन्म होता है।
एक सामान्य गाय का जीवनकाल 15 वर्ष के लगभग होता है। अगर इसके बचपन और बुढ़ापे की अवधि को निकाल दिया जाए, तो यह लगभग दस वर्ष स्वस्थ दुधारू पशु की तरह काम करती है। इस बीच सामान्य विधि से इसके आठ से दस बच्चे पैदा हो सकते हैं। इनमें प्राकृतिक रूप से कुछ मादा तो कुछ नर होते हैं। खेती में बैलों की उपयोगिता लगभग खत्म होने की कगार पर है। ऐसे में किसान इन नर पशुओं को खुला छोड़ देते हैं। इससे खेती को भारी नुकसान होता है।
ये सड़कों पर यातायात में भी बहुत परेशानी पैदा करते हैं। जबकि वैज्ञानिक विधि भ्रूण प्रतिस्थापन विधि (Embryo Transfer Technology) में 90 फीसदी दुधारू बछिया पैदा होती हैं। शेष दस फीसदी नर पशु (बैल) बनेंगे जो वीर्य उत्पादन में काम आएंगे और उनकी उपयोगिता बनी रहेगी।
भ्रूण को प्रयोगशाला में विकसित कर सामान्य गाय में प्रतिस्थापन की यह विधि किसानों के लिहाज से बहुत उपयोगी है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इस तकनीकी से एक गाय के जीवन काल में सामान्य आठ-दस बच्चों की तुलना में सौ से भी ज्यादा गायें पैदा की जा सकेंगी। साथ ही, हर गाय 30 से 40 लीटर दूध पैदा करने की क्षमता की होगी, जबकि सामान्य भारतीय गाय दो से तीन लीटर दूध ही देती है।
भ्रूण प्रतिस्थापन विधि में एक दाता गाय से एक बार में दस से बीस अंडे निकाल लिया जाता है। इन्हें ‘सोर्टेड वीर्य’ से निषेचित कराया जाता है। इस प्रकार इन अंडों में से लगभग पांच-छह भ्रूण बन जाते हैं। व्यावहारिक स्तर पर इनमें लगभग दो या तीन भ्रूण परिपक्व होकर बच्चे के रूप में जन्म लेते हैं। यह प्रक्रिया एक दाता गाय से हर दस दिन में एक बार और महीने में तीन बार तक कराई जा सकती है। इस प्रकार एक दाता गाय से आठ से दस बच्चे प्रतिमाह अन्य गायों में प्रतिस्थापित कराकर पैदा कराये जा सकते हैं। एक वर्ष में यह संख्या सौ से भी अधिक हो सकती है।
सामान्य रूप से भी उन्नत किस्म के सांडों के वीर्य से गायों को क्रॉस करवाकर गायों का नस्ल सुधार हो रहा है, लेकिन इस विधि में पैदा हुए बच्चे बछड़े या बछिया कुछ भी हो सकते हैं, जबकि इस विधि में 90 फीसदी बच्चे बछिया ही होती हैं। दूसरे इस प्रकार केवल आठ-दस बच्चे ही पैदा हो सकते हैं जबकि इस विधि से भारी संख्या में बच्चे पैदा किये जा सकते हैं। इस प्रकार नई विधि ज्यादा उपयोगी है।
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर श्याम जवर के मुताबिक उन्होंने इसी तकनीक का उपयोग करते हुए राधा नाम की एक गाय से एक वर्ष में 14 बच्चे पैदा कराने में सफलता पाई है। एक अन्य गाय गौरी से पिछले छह महीनों में 56 गर्भाधान करवा चुके हैं। ये सभी बच्चे अगले वर्ष में जनवरी से जून माह के अंत में पैदा होंगे। इनमें 38 गायों को पुणे के एक फार्म पर तो बाकी 18 गायों को किसानों के घरों पर पाला जा रहा है। उनका लक्ष्य इस गाय से एक वर्ष में 100 बच्चे पैदा करवाने का है, जिसे वे 2020 में पूरा कर देना चाहते हैं।
तकनीकी जटिलताओं के कारण आईवीएफ तकनीकी काफी महंगी होती है। फिर भी न्यूनतम स्तर पर तीस हजार रुपये के लगभग प्रति गर्भाधान के हिसाब से इसकी कीमत आती है। गायों के नस्ल सुधार में यह तकनीकी जहां बहुत कारगर साबित हो रही है, वहीं भैंसों के मामले में तकनीकी जटिलताओं के कारण इसमें अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है।