वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीति बनाने के लिए हर साल होने वाले संयुक्त राष्ट्र के कॉप 26 (कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज-26) सम्मेलन से पहले विकसित और विकासशील देशों के बीच अविश्वास की खाई गहरी होती नजर आ रही है। एक नवंबर से ब्रिटेन के ग्लासगो में शुरू हो रहा सम्मेलन 12 नवंबर तक चलेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 1 व 2 नवंबर को इसमें शामिल होंगे।
सम्मेलन में भारत दुनिया के सभी देशों से काॅर्बन उत्सर्जन और घटाने की मांग करने के साथ-साथ विकसित देशों पर इस बात के लिए दबाव बनाएगा कि वो क्लाइमेट फाइनांस के लिए वादे के अनुसार सालाना 100 अरब डॉलर की राशि और प्रौद्योगिकी दुनिया के विकासशील और गरीब देशों को दें ताकि ये देश विकास की दौड़ में पिछड़े बिना जलवायु परिवर्तन से बचाव में अपनी भूमिका अदा कर सकें। दूसरी ओर विकसित देश भारत और चीन समेत विकासशील देशों से ‘नेट जीरो’ (जितना काॅर्बन उत्सर्जन, उतना वायुमंडल से हटाना) घोषित करने का दबाव बनाएंगे।
वर्ष 2009 में कोपेनहेगन सम्मेलन में विकसित देशों ने तय किया था कि काॅर्बन उत्सर्जन कम करने के लिए विकासशील देशों को वर्ष 2020 तक हर साल 100 अरब डॉलर दिए जाएंगे। लेकिन सितंबर-2021 में जारी ओईसीडी रिपोर्ट के अनुसार विकासशील देशों को 2019 में 79.6 अरब डॉलर ही प्राप्त हुए, जो वादे से 21 बिलियन डॉलर कम हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक तापमान बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने से रोकना होगा। अभी वैश्विक तापमान सिर्फ 1.1 डिग्री बढ़ा है और तबाहियां आनी शुरू हो गई हैं। अमीर देशों के पास संसाधन हैं, गरीब देश कैसे लड़ेंगे?
शीर्ष काॅर्बन उत्सर्जक देश
| देश |
CO2 उत्सर्जन
(BMT) |
वैश्विक भागीदारी |
| चीन |
9.43 |
27.8 फीसदी |
| अमेरिका |
5.15 |
15.2 फीसदी |
| भारत |
2.48 |
7.3 फीसदी |
| रूस |
1.55 |
4.6 फीसदी |
| जापान |
1.15 |
3.4 फीसदी |
स्रोत: फोर्ब्स सूची वर्ष-2018
दुनिया को कितना उत्सर्जन घटाने की जरूरत
उत्सर्जन गैप रिपोर्ट 2021 के अनुसार दुनिया के देशों ने 2030 तक काॅर्बन उत्सर्जन घटाने के लिए जो लक्ष्य हासिल करने पर सहमति दी है उससे पूरी दुनिया में काॅर्बन उत्सर्जन सिर्फ 7.5 प्रतिशत कम होगा जबकि वर्तमान स्थिति ये है कि पूरी दुनिया को तत्काल कम से कम 55 प्रतिशत उत्सर्जन घटाने की जरूरत है तभी ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखा जा सकेगा।
अमेरिका-चीन के बीच दरार से बढ़ी चुनौती
दुनिया के सबसे बड़े दो काॅर्बन उत्सर्जक देशों अमेरिका और चीन के बीच राजनयिक संबंध बिगड़ गए हैं। अमेरिका के विशेष दूत जॉन केरी इस वर्ष चीन से जलवायु परिवर्तन पर कोई वादा नहीं ले सके। अमेरिका और चीन ने अपना ‘नेट जीरो’ क्रमश: 2050 और 2060 तय किया है।
क्लाइमेट फाइनेंस व्यापारिक निवेश नहीं: भूपेंद्र यादव
क्लाइमेट फाइनेंस को व्यापारिक निवेश नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि ये विकासशील देशों की मदद है, ताकि वो अपने जलवायु लक्ष्य को पा सकें।
-भूपेंद्र यादव, केंद्रीय जलवायु एवं पर्यावरण मंत्री
क्या है नेट जीरो
कोई देश जितना ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है, उतनी ही मात्रा में इन गैसों को पेड़ों या तकनीक से सोख लिया जाए, यानी जितना उत्सर्जन हुआ उतनी मात्रा में ग्रीन हाउस गैसों को वायुमंडल से हटा दिया गया।
60 फीसदी उत्सर्जन कर रहे हैं 10 देश
क्लाइमेट वाच संस्था के अनुसार दुनिया में होने वाले कुल काॅर्बन उत्सर्जन का 60% सिर्फ दस देशों से होता है, जबकि 100 देश 3% से भी कम उत्सर्जन कर रहे हैं।
प्रति व्यक्ति काॅर्बन उत्सर्जन में भारत बहुत नीचे
दुनिया में काॅर्बन उत्सर्जन के मामले में भारत भले ही तीसरे नंबर पर है, लेकिन प्रति व्यक्ति काॅर्बन उत्सर्जन के मामले में बहुत नीचे है।
दुनिया का सबसे बड़ा काॅर्बन उत्सर्जक चीन
- वर्ष 2000 में चीन का काॅर्बन उत्सर्जन 4.25 गीगाटन और अमेरिका का 6.45 गीगाटन था।
- वर्ष 2018 में चीन का 11.71 गीगाटन हो गया जबकि अमेरिका का काॅर्बन उत्सर्जन घटकर 5.71 गीगाटन रह गया।
जलवायु परिवर्तन का पूरी दुनिया पर असर
लू या गर्म हवाएं चलने, सूखा, बाढ़, चक्रवात, जंगल में आग जैसी मौसम से जुड़ी चरम घटनाएं बेतहाशा बढ़ीं
भारत में 1970 की तुलना में बाढ़ की घटनाएं 8 प्रतिशत और भूस्खलन, बादल फटने व ओलावृष्टि की घटनाएं 20 गुना बढ़ गई हैं। सूखे से प्रभावित जिलों का वार्षिक औसत 13 गुना बढ़ गया है। भारत में 75 प्रतिशत जिले जलवायु संबंधी चरम घटनाओं के केंद्र में हैं और इन जिलों में देश की 80 प्रतिशत आबादी रहती है।