सर्वोच्च अदालत ने ईडी की तरफ से बिना किसी जरूरत के कैद को लंबा करने के लिए पीएमएलए के प्रावधानों के दुरुपयोग पर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब पीएमएलए के तहत शिकायत की सुनवाई उचित सीमा से अधिक लंबी होने की संभावना है, तो संवैधानिक अदालतों को जमानत देने के लिए अपनी शक्तियों का प्रयोग करने पर विचार करना होगा। कारण यह है कि धारा 45(1)(ii) (पीएमएलए) राज्य को किसी आरोपी को अनुचित रूप से लंबे समय तक हिरासत में रखने की शक्ति नहीं देती है, खासकर जब उचित समय के भीतर मुकदमे के समाप्त होने की कोई संभावना नहीं है।
सेंथिल बलाजी को जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
उचित समय क्या होगा यह उन प्रावधानों पर निर्भर करेगा जिनके तहत आरोपी पर मुकदमा चलाया जा रहा है और अन्य कारक। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा, सबसे प्रासंगिक कारकों में से एक अपराध के लिए न्यूनतम और अधिकतम सजा की अवधि है। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी तमिलनाडु के पूर्व मंत्री और डीएमके के कद्दावर नेता सेंथिल बालाजी को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जमानत देते हुए की।
जमानत नियम है और जेल अपवाद है- सुप्रीम कोर्ट
यह देखते हुए कि मुकदमे के समापन में अत्यधिक देरी और जमानत देने की उच्च सीमा एक साथ नहीं चल सकती, शीर्ष अदालत ने कहा कि यह देश के आपराधिक न्यायशास्त्र का एक सुस्थापित सिद्धांत है कि जमानत नियम है और जेल अपवाद है। कोर्ट ने कहा, पीएमएलए की धारा 45(1)(iii) जैसे जमानत देने के संबंध में ये कड़े प्रावधान एक ऐसा साधन नहीं बन सकते जिसका इस्तेमाल आरोपी को बिना सुनवाई के अनुचित रूप से लंबे समय तक कैद में रखने के लिए किया जा सके।
केवल संवैधानिक अदालतें ही कर सकती है असाधारण शक्तियों का प्रयोग
केए नजीब मामले में अपने फैसले का हवाला देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि असाधारण शक्तियों का प्रयोग केवल संवैधानिक अदालतें ही कर सकती हैं। पीठ ने कहा, सांविधानिक अदालतों के न्यायाधीशों के पास व्यापक अनुभव है। रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों के आधार पर, यदि न्यायाधीश यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उचित समय में मुकदमे के समाप्त होने की कोई संभावना नहीं है, तो संवैधानिक अदालतें वैधानिक प्रावधानों के बावजूद भारत के संविधान के भाग III के उल्लंघन के आधार पर जमानत देने की शक्ति का प्रयोग हमेशा कर सकती हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि संवैधानिक अदालतें हमेशा अनुच्छेद 32 या अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग कर सकती हैं, जैसा भी मामला हो। पीठ ने कहा कि पीएमएलए के तहत मामलों से निपटने के दौरान संवैधानिक अदालतों को यह ध्यान में रखना होगा कि कुछ असाधारण मामलों को छोड़कर, अधिकतम सजा सात साल हो सकती है।