उत्तर प्रदेश सरकार ने संतुलन साधने के लिए हर वर्ग के लोगों की भागीदारी को बढ़ाने का काम किया है। ओबीसी और एससी/एसटी समुदाय के लोगों की भागीदारी बढ़ाकर हर वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की गई है। आगामी मंत्रिमंडल विस्तार में इसे और धार देने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन बताया जा रहा है कि सरकार का यह फॉर्मूला बहुत कारगर साबित नहीं होने वाला है।
इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण यह है कि ओबीसी समुदाय के मंत्री अपने वर्ग को ज्यादा मजबूती के साथ राज्य के मंत्रिमंडल में देखना चाहते हैं। इसके साथ ही कई मंत्री केशव प्रसाद मौर्य को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट न किए जाने से असंतुष्ट हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में उपयुक्त समीकरण न बन पाने पर इस वर्ग की नाराजगी सामने आ सकती है, जो योगी आदित्यनाथ सरकार पर भारी पड़ सकती है।
उत्तर प्रदेश में 15 फीसदी वोट बैंक वाले ब्राह्मण समुदाय की राज्य की भाजपा सरकार से नाराजगी जारी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में एक ब्राह्मण मंत्री बढ़ाकर इस वर्ग की नाराजगी को कम किए जाने की कोशिशें की गई थीं, और आगामी मंत्रिमंडल विस्तार में भी ब्राह्मणों की भागीदारी बढ़ाने की संभावना है, लेकिन कथित तौर पर इसका अभी भी कोई सकारात्मक असर नहीं देखने को मिला है। साथ ही, इस वर्ग की नाराजगी भाजपा के सामने मुश्किलें खड़ी कर सकती है क्योंकि यह वर्ग भाजपा और योगी आदित्यनाथ का कोर सपोर्टर वोटर वर्ग रहा है।
केंद्र सरकार ने मेडिकल कोटे में ओबीसी आरक्षण को मान्यता दे दी है। भाजपा ने यह दांव उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ओबीसी समुदाय के वोटरों को ध्यान में रखते हुए ही लिया है। लेकिन, आशंका है कि भाजपा का यह दांव उत्तर प्रदेश में ही उलटा पड़ सकता है। अनेक सवर्ण संगठन मेडिकल में भी ओबीसी आरक्षण लागू करने के विरोध में हैं। राज्य सरकार को इसका भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।