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सुप्रीम कोर्ट: केंद्र ने कहा- एनजीटी को स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार नहीं

Fri, 03 Sep 2021 02:52 AM IST
Jeet Kumar एजेंसी, नई दिल्ली।

सार

  • पर्यावरण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर बताए न्यायाधिकरण की शक्तियां व कर्तव्य
  • पीठ अब इस मामले में 7 सितंबर को सुनवाई करेगी
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ani
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विस्तार
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केंद्र सरकार ने बृहस्पतिवार को सुप्रीम कोर्ट में बताया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार नहीं है। जिस कानून के तहत इसका गठन किया गया है, उसमें इस तरह के किसी अधिकार का जिक्र नहीं है। सुप्रीम कोर्ट महाराष्ट्र के एक मामले से जुड़ी याचिकाओं पर यह तय करने के लिए सुनवाई कर रहा था कि क्या एनजीटी किसी मामले पर खुद से संज्ञान ले सकती है।

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जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने केंद्र के इस पक्ष पर एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्य भाटी से पूछा कि अगर कोई पत्र या हलफनामा एनजीटी के पास आए तो भी क्या वह उस पर संज्ञान नहीं ले सकता।

इस पर भाटी ने कहा, पत्र या हलफनामा मिलने के बाद मामले पर संज्ञान लेना व उस पर सुनवाई करना एनजीटी के प्रक्रियात्मक अधिकार हैं। एनजीटी इन पर सुनवाई कर उल्लंघन के कारणों का पता लगाने और मामले में शामिल पार्टियों को नियमों का पालन करने के लिए उचित व्यवस्था देने का पूरा अधिकार रखता है।
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इस दौरान पीठ ने न्यायमित्र आनंद ग्रोवर समेत अन्य वकीलों की दलीलें भी सुनीं। पीठ अब इस मामले में 7 सितंबर को सुनवाई करेगी।

प्रक्रियात्मक पहलू शक्तियों व अधिकारों को बाधित नहीं कर सकते: मंत्रालय
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से पेश भाटी ने पीठ को बताया कि पर्यावरण नियमों के अनुपालन और इसकी निगरानी के उद्देश्य को लेकर एनजीटी का गठन हुआ था।

प्रक्रियात्मक पहलू न्यायाधिकरण की शक्तियों व अधिकारों को बाधित नहीं कर सकते। लेकिन कानून में कहीं भी स्वतऱ् संज्ञान लेने का अधिकार नहीं दिया गए है। हालांकि इसकी शक्तियां किसी सूरत में कम नहीं हैं।

एनजीटी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत पर काम करता है
भाटी ने राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण कानून 2010 की धारा 19 (1) का उल्लेख करते हुए कहा, एनजीटी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर काम करता है। इस धारा में स्पष्ट कहा गया है कि यह न्यायाधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से बाध्य नहीं होगा।

क्या है मामला
एनजीटी ने महाराष्ट्र में एक अपशिष्ट प्रबंधन के मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए पर्यावरण नियमों के उल्लंघन पर नगर महापालिका के ऊपर 5 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। जिसके बाद कई याचिकाएं दाखिल कर सवाल उठाया गया है कि क्या एनजीटी स्वत: संज्ञान ले सकता है।

सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि बॉम्बे हाईकोर्ट पहले ही इस मामले पर सुनवाई कर रहा है तो क्या ऐसे में एनजीटी को स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार है।

कोर्ट ने कहा, पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन दो पक्षों के बीच विवाद नहीं, आम जन का मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में कहा था कि पर्यावरण और वन कानूनों का उल्लंघन केवल दो पक्षों के बीच विवाद नहीं है, बल्कि यह आम जनता को भी प्रभावित करता है। पर्यावरण से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन सहित पर्यावरण संरक्षण, वनों के संरक्षण और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित मामलों के प्रभावी और शीघ्र निपटारे के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम (एनजीटी), 2010 के तहत अधिकरण की स्थापना की गई है।

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