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बीएसएफ डीजी के कंधे पर नहीं होता 'टाइटल शोल्डर', उनकी बेल्ट भी है काली, पढ़ें 1970 से चली आ रही ये कहानी

Tue, 18 Aug 2020 05:42 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

बीएसएफ में यह परंपरा 1970 से ही चली आ रही है। अमूमन 'टाइटल शोल्डर' आर्मी में एक रैंक के बाद नहीं लगाया जाता। बीएसएफ की जब स्थापना हुई तो बहुत सी बातें सेना के कायदे-कानूनों वाली अपनाई गई थीं...
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Rakesh Asthana took over charge as the 27th Director General of BSF - फोटो : BSF
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विस्तार
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गुजरात कैडर के 1984 बैच के आईपीएस राकेश अस्थाना ने मंगलवार को सीमा सुरक्षा बल 'बीएसएफ' के 27वें डीजी का पदभार ग्रहण कर लिया है। उनके पदभार ग्रहण करने की प्रक्रिया में दो बातें खास रही हैं। पहली, अस्थाना के कंधे पर टाइटल शोल्डर नहीं लिखा है। यानी कंधे पर न तो आईपीएस लिखा है और न ही बीएसएफ। दूसरा, उनकी बेल्ट का रंग काला है।

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उन्हें डीजी का पदभार सौंपने वाले आईटीबीपी डीजी एसएस देसवाल के कंधे पर आईपीएस लिखा है। उनकी बेल्ट भी ब्राउन कलर की है। सीएपीएफ में केवल बीएसएफ में ही यह परंपरा है। अन्य किसी भी फोर्स में आपको ऐसा देखने को नहीं मिलेगा।

बीएसएफ में यह परंपरा 1970 से ही चली आ रही है। अमूमन 'टाइटल शोल्डर' आर्मी में एक रैंक के बाद नहीं लगाया जाता। बीएसएफ की जब स्थापना हुई तो बहुत सी बातें सेना के कायदे-कानूनों वाली अपनाई गई थीं।
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बीएसएफ से रिटायर एडीजी एसके सूद बताते हैं, अगर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल 'सीएपीएफ' की बात करें, तो इनमें से केवल बीएसएफ के अफसरों को ही 'टाइटल शोल्डर' लगाने से छूट मिली है। हालांकि यह छूट कमांडेंट जो कि 'सिलेक्शन ग्रेड' में आ गया हो या डीआईजी के पद से शुरू होती है।

डीआईजी से लेकर डीजी तक चाहे कोई आईपीएस हो या कैडर अधिकारी, वे सब 'टाइटल शोल्डर' वाली जगह को खाली रखते हैं। दूसरे किसी भी बल जैसे सीआरपीएफ, आईटीबीपी, एसएसबी या सीआईएसएफ में ऐसा नहीं है। वहां डीजी तक के सभी अफसरों को अपने कंधे पर बतौर 'टाइटल शोल्डर' आईपीएस या बल का नाम लिखना होता है।

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BSF DG Rakesh Asthana - फोटो : BSF
बीएसएफ में इसकी स्थापना के बाद से ही बल के पहले डीजी केएफ रुस्तम जी ने 'एकीकृत व्यवस्था' पर सबसे अधिक जोर दिया गया था। शुरुआत में तो आर्मी से इस बल में अफसर आए थे। उस वक्त आर्मी में यह परंपरा थी कि यूनिट कमांडर से बड़े रैंक वाले अफसर 'टाइटल शोल्डर' नहीं लगाएंगे।

जैसे ग्रेनेडियर, जाट व गढ़वाल आदि नहीं लिखा होता। उनके साथ ही यही परंपरा बीएसएफ में चली आई। डीजी केएफ रुस्तम जी की सोच यह थी कि इस बल में अलग-अलग संगठनों से लोग आए हैं, इसलिए उनमें एकता और समन्वय की भावना होना बहुत जरूरी है। बीएसएफ में आए जवान और अधिकारी केवल अपनी फोर्स की बात करें, कोई और नहीं, उनकी इसी सोच के चलते बीएसएफ में भी आर्मी की परंपरा लागू हो गई।
 
1970 के दशक में बीएसएफ ज्वाइन करने वाले एसके सूद के अनुसार, कई आईपीएस अफसरों को 'टाइटल शोल्डर' न लगाने की बात खलती रही है। पूर्व डीजी डीके पाठक के समय में एक आईजी इस बात को लेकर अड़ गए थे कि वे आईपीएस हैं, तो वह अपने कंधे पर लिखेंगे। इसका कैडर अफसरों ने खासा विरोध किया था।

हालांकि बाद में उक्त आईपीएस को कंधे पर टाइटल शोल्डर लिखने की अनुमति नहीं दी गई। इसी तरह विभिन्न बलों के अफसर ब्राउन कलर की बेल्ट लगाते हैं, लेकिन बीएसएफ डीजी को काले रंग की बेल्ट मिलती है। इसी तरह वह शूज भी काले रंग के पहनता है।

उनका डिजाइन भी वही रहता है, जैसे दूसरे अफसर पहनते हैं। ये सब बातें बल में एकता, सामंजस्य व सहयोग बनाए रखने के लिए होती हैं। नए डीजी राकेश अस्थाना ने भी लंबे दौर की परंपराओं को निभाया है। यह बल के लिए अच्छी बात है।
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