बीएसएफ में इसकी स्थापना के बाद से ही बल के पहले डीजी केएफ रुस्तम जी ने 'एकीकृत व्यवस्था' पर सबसे अधिक जोर दिया गया था। शुरुआत में तो आर्मी से इस बल में अफसर आए थे। उस वक्त आर्मी में यह परंपरा थी कि यूनिट कमांडर से बड़े रैंक वाले अफसर 'टाइटल शोल्डर' नहीं लगाएंगे।
जैसे ग्रेनेडियर, जाट व गढ़वाल आदि नहीं लिखा होता। उनके साथ ही यही परंपरा बीएसएफ में चली आई। डीजी केएफ रुस्तम जी की सोच यह थी कि इस बल में अलग-अलग संगठनों से लोग आए हैं, इसलिए उनमें एकता और समन्वय की भावना होना बहुत जरूरी है। बीएसएफ में आए जवान और अधिकारी केवल अपनी फोर्स की बात करें, कोई और नहीं, उनकी इसी सोच के चलते बीएसएफ में भी आर्मी की परंपरा लागू हो गई।
1970 के दशक में बीएसएफ ज्वाइन करने वाले एसके सूद के अनुसार, कई आईपीएस अफसरों को 'टाइटल शोल्डर' न लगाने की बात खलती रही है। पूर्व डीजी डीके पाठक के समय में एक आईजी इस बात को लेकर अड़ गए थे कि वे आईपीएस हैं, तो वह अपने कंधे पर लिखेंगे। इसका कैडर अफसरों ने खासा विरोध किया था।
हालांकि बाद में उक्त आईपीएस को कंधे पर टाइटल शोल्डर लिखने की अनुमति नहीं दी गई। इसी तरह विभिन्न बलों के अफसर ब्राउन कलर की बेल्ट लगाते हैं, लेकिन बीएसएफ डीजी को काले रंग की बेल्ट मिलती है। इसी तरह वह शूज भी काले रंग के पहनता है।
उनका डिजाइन भी वही रहता है, जैसे दूसरे अफसर पहनते हैं। ये सब बातें बल में एकता, सामंजस्य व सहयोग बनाए रखने के लिए होती हैं। नए डीजी राकेश अस्थाना ने भी लंबे दौर की परंपराओं को निभाया है। यह बल के लिए अच्छी बात है।