बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे सत्र अदालत के साल 2011 में पारित एक आदेश को बरकरार रखा है जिसमें तीन लोगों को सामूहिक दुष्कर्म के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। लेकिन, इसके साथ ही अदालत ने इस मामले में बचाव पक्ष के वकीलों और न्यायाधीश के खिलाफ आलोचनात्मक टिप्पणी भी थी।
बता दें कि 28 सितंबर को पारित एक आदेश में न्यायाधीश साधना जाधव और सारंग कोतवाल की पीठ ने आरोपियों की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए, इस मामले में बचाव पक्ष के वकीलों और न्यायाधीश के आचरण पर, विशेष रूप से पीड़िता से जिरह के दौरान, कुछ कठोर टिप्पणियां कीं।
अपना कर्तव्य निभाने में नाकाम रहे सत्र न्यायाधीश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वर्तमान मामले में सत्र न्यायाधीश, पीड़ित युवती की मर्यादा की सुरक्षा करने के अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में नाकाम रहे हैं। उल्लेखनीय है कि यह मामला पुणे का है जहां के हिंजेवाड़ी इलाके में एक एमबीए स्नातक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया गया था।
बचाव पक्ष के वकीलों ने की बेहद अनुचित जिरह
मामले में उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि बचाव पक्ष के वकीलों ने आरोपियों को बचाने की कोशिश में अन्य वस्तुओं के साथ यह साबित करने की भी कोशिश की कि पीड़िता ने शराब का सेवन किया हुआ था और उसने आरोपी के साथ अपनी सहमति से शारीरिक संबंध बनाए थे और उसके साथ दुष्कर्म नहीं किया गया था।
अभियोजन पक्ष की चुप्पी पर भी खड़े किए सवाल
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने इस तरह के सवालों के दौरान अभियोजन पक्ष के चुप रहने पर पर भी सवाल खड़े किए। अदालत ने कहा कि मामले की सुनवाई करने वाले सत्र न्यायाधीश को निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए था और जब वकील पीड़िता के साथ इस तरह की अनुचित जिरह कर रहे थे तब उन्हें इसमें दखल देना चाहिए था।