विजय रूपाणी जब गांधीनगर में पाटीदार समुदाय के एक शैक्षिक परिसर के शिलान्यास समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ थे तो किसी को अंदाजा नहीं था वे कुछ घंटे बाद इस्तीफा दे देंगे। इस कार्यक्रम में पीएम मोदी ने वर्चुअल संबोधन किया था। गुजरात में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में मुख्यमंत्री बदला जा रहा है। मुख्यमंत्री पद से विजय रूपाणी के इस्तीफे के नाम चार नामों पर मंथन जारी है। बीते कुछ समय से गुजरात में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें लग रही थीं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि भाजपा को उत्तराखंड और कर्नाटक के बाद गुजरात में नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत महसूस हुई।
चुनाव जीतना पहला लक्ष्य
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम नहीं लिखे जाने की शर्त पर बताया-देखिए किसी भी राजनीतिक दल का पहला लक्ष्य होता है चुनाव जीतना और चुनाव जीतने के लिए सर्व सहमति के नेतृत्व की बड़ी शर्त होती है। यदि नेतृत्व संतोषजनक नहीं है या किसी भी तरह की सत्ताविरोधी लहर देखी जाती है तो आलाकमान को यह देखना ही पड़ता है कि चुनाव जीतने के लिए क्या किया जा सकता है। कहीं न कहीं रूपाणी पर अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव था और वे वैसा सियासी प्रभाव नहीं जमा सके थे जैसी पार्टी को उम्मीद थी। पार्टी चाहती है कि कोई ऐसा मुख्यमंत्री बने जो शीर्ष नेतृत्व की आशाओं और उम्मीद के अनुरूप काम कर जिससे लोग रूपाणी सरकार के कामकाज के बजाए नए मुख्यमंत्री के कामकाज का आकलन करें और उसी नाम पर चुनाव लड़ा जाए।
भाजपा के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल
सूत्रों का कहना है कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सीआर पाटिल के पद संभालने के बाद रूपाणी को लेकर प्रदेश से अंसतोष की कई आवाजें सुनाई दीं। लिहाजा सीआर पाटिल ने पार्टी को यह साफ कर दिया कि अगर अगले साल चुनाव में बड़ी जीत हासिल करनी है तो फिर नेतृत्व परिवर्तन पर विचार करना ही होगा। दूसरी तरफ रूपाणी भले ही मृदुभाषी मुख्यमंत्री रहे हों, लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इससे उनकी 'कमजोर' मुख्यमंत्री होने की छवि बन गई जिससे नौकरशाह महत्वपूर्ण निर्णय लेने में हावी हो गए।
दरअसल पार्टी ने पिछला विधानसभा चुनाव जैसे-तैसे जीत कर अपनी प्रतिष्ठा बचाई थी। यहां भाजपा को बड़ी मुश्किल से जीत हासिल हुई थी। भाजपा ने राज्य में लगातार छठी बार जीत तो दर्ज की लेकिन उसे 99 सीटों पर संतोष करना पड़ा था, जबकि कांग्रेस को इस चुनाव में 77 सीटें मिली थीं। गुजरात में विधानसभा की 182 सीटें हैं। पिछले तीन चुनाव में भाजपा की सीटें यहां लगातार घट रही थीं और कांग्रेस आगे बढ़ रही थी। 2007 में भाजपा ने 117 सीटें जीती थीं, जो 2017 के चुनाव में घटकर 99 पर आ गई। वहीं कांग्रेस ने 2007 के चुनाव में 59 सीटें जीती थी, जो 2017 के चुनाव में बढ़कर 77 हो गईं। गुजरात नरेंद्र मोदी का गृहराज्य माना जाता है ऐसे में यहां चुनाव जीतना भाजपा के लिए प्रतिष्ठा के सवाल से कम नहीं।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 2002 का पहला गुजरात विधानसभा चुनाव लड़ा था। जिसमें प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की। इस विधानसभा चुनाव में भाजपा को 127 सीटें मिली थीं। यह अब तक भाजपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा था। गुजरात की सत्ता में भाजपा पहली बार 1995 में आई थी। जिसका श्रेय केशुभाई पटेल को दिया जाता है। 1995 में राज्य की 182 सीटों में बीजेपी को 121 सीटें मिली थी।
रूपाणी के जरिए जातीय समीकरण साधना मुश्किल था
रूपाणी के इस्तीफे की दूसरी बड़ी वजह गुजरात का जातीय समीकरण भी बताया जाता है। रूपाणी के रहने से पार्टी चुनाव में जातीय समीकरण नहीं साध पाती। राज्य में पिछले ढाई दशक से राजनीति पाटीदार समाज के इर्द गिर्द ही घूमते नजर आती है, केंद्र व गुजरात सरकार में भी पाटीदार समाज के लोगों को कई अहम मंत्रालय मिले हैं। कुछ शीर्ष समुदाय के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि गुजरात का अगला मुख्यमंत्री पाटीदार होना चाहिए। इसी समीकरण को साधने के लिए ही कुछ समय पहले केंद्र के मंत्रिमंडल विस्तार में मनसुख मंडाविया को जगह दी गई है।
रूपाणी के लिए कोरोना की दूसरी लहर भी उनकी कुर्सी के लिए खतरे की घंटी बजा कर गई। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान गुजरात में अव्यवस्था की कई खबरों से प्रधानमंत्री नाराज बताए जा रहे थे। लिहाजा पार्टी नहीं चाहती कि कोई भी ऐसी स्थिति बनी रहे जिससे पार्टी के लिए चुनाव जीतना मुश्किल हो जाए। विशेषज्ञ बताते हैं कि यही बात भाजपा को दूसरी पार्टियों से अलग करती है, वो चुनाव जीतने के लिए नेतृत्व परिवर्तन से भी पीछे नहीं हटती है। जो काम कांग्रेस नहीं कर पाती, वह भाजपा बहुत आसानी से कल लेती है।
रावत और येदियुरप्पा की कुर्सी भी इसी वजह से गई
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिए कर्नाटक और उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बदलना भी चुनाव जीतने की पहली शर्त के तहत ही लिया गया फैसला था। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भी कुर्सी भी इसलिए गई क्योंकि उन्होंने कुछ ऐसे फैसले किए थे जिससे पार्टी को चुनाव में नुकसान होने का डर था। दरअसल रावत ने गढ़वाल के हिस्से गैरसैंण मंडल में कुमांऊ के दो जिलों अल्मोड़ा और बागेश्वर को शामिल करने का फैसला किया था जिसे कुमांऊ की अस्मिता और पहचान पर हमला माना गया।
सरकार के इस फैसले के खिलाफ पूरे कुमाऊं के भाजपा नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व के सामने मोर्चा खोल दिया था। वहीं रावत पर अफसरशाही को बढ़ावा देने का भी आरोप था। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले रावत के इन फैसलों को पार्टी ने खतरनाक माना केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें समझा दिया कि अब उनकी विदाई का वक्त आ गया है।
बीएस येदियुरप्पा चौथी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन अपने चौथे कार्यकाल में भी वो कुर्सी पर केवल दो साल ही टिक पाए। उनके खिलाफ पार्टी में असंतोष पैदा हो रहा था। सीनियर नेताओं ने उनकी अनदेखी करने का आरोप लगाया था। उन पर भ्रष्टाचार में शामिल होने और उनके बेटे के सरकारी कामकाज में दखल होने के भी आरोप लग रह थे। पार्टी में मुख्यमंत्री के खिलाफ यदि असंतोष हो तो पार्टी के लिए चुनाव जीतना मुश्किल हो सकता है, इसी फॉर्मूले के तहत येदियुरप्पा से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली गई। वे 2019 में राज्य के मुख्यमंत्री बने थे।
आगे क्या
उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल, केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडाविया, लोकसभा सांसद सीआर पाटिल और पुरषोत्तम रुपाला का नाम इस रेस में शामिल है। मंडाविया का नाम इस दौड़ में सबसे आगे बताया जा रहा है। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का करीबी माना जाता है। मांडविया पाटीदार समुदाय के बड़े नेता माने जाते हैं। कोरोना महामारी के बीच में जब उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई थी तभी राजनीतिक पंडितों ने यह अनुमान लगाया था कि वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं।
इसी तरह पुरुषोत्तम रूपाला भी पाटीदार समुदाय से आते हैं। सीआर पाटिल भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार माने जा रहे हैं। उन्हें पिछले साल जुलाई में गुजरात का पार्टी अध्यक्ष बनाया गया। वे नवसारी से तीसरी बार सांसद बने हैं। वे 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस के इंचार्ज थे। इसके अलावा गोरधन जदाफिया का भी नाम मुख्यमंत्री पद के लिए चर्चा में है। जदाफिया गुजरात में भाजपा के उपाध्यक्ष हैं और 2002 के दंगों के दौरान गृह राज्य मंत्री थे। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा वैसे प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी ‘सरप्राइज’ देने के लिए जाने जाते हैं इसलिए हो सकता है जो नाम मीडिया के सामने नहीं है उनमें से किसी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया जाए।