पाक, ईरान से समर्थन नहीं
लॉन्ग वॉर जनरल के बिल रोजियो का मानना है कि तालिबान आईएस पर काबू पा सकता है। इसके लिए उसे अमेरिकी हवाई हमलों की भी जरूरत नहीं है। उनके मुताबिक, आईएस के लिए सबसे मुश्किल यह है कि उसे पाकिस्तान और ईरान में शरण और समर्थन नहीं मिलेगा।
प्रशासन पर पकड़, समावेशी सरकार से आईएस पर जीत संभव
आतंकवाद से प्रशासन की ओर बढ़ते तालिबान को समावेशी सरकार पर ध्यान देना होगा। हजारा जैसे अल्पसंख्यकों को बचाना होगा। उन्होंने हिंसा झेली है और अब आईएस भी उन्हें निशाना बना रहा है। जानकारों का मानना है कि तालिबान के लिए मौका है कि वह अल्पसंख्यकों के साथ खड़ा हो और प्रशासन पर पकड़ वाली छवि पेश करे, ताकि लोगों का झुकाव आईएस की तरफ न हो।
आईएस का मकसद तालिबान की छवि खराब करना
अंतरराष्ट्रीय संकट समूह में सलाहकार इब्राहिम बहिस का कहना है, अफगानिस्तान में हमले कर के आईएस ने तालिबान को तगड़ा झटका दिया है और खतरा थोड़े समय का ही नहीं है। आईएस का तात्कालिक मकसद तालिबान को अस्थिर कर मुल्क की हिफाजत करने वाली छवि तोड़ना है। यही वजह है कि वह जनजातियों और अन्य छोटे समूहों को साथ मिला रहा है।
तालिबान लड़ाकों के सहारे खड़ी हुई आईएस की फौज
आईएस अफगानिस्तान में छह साल पहले खुरासान प्रांत में उभरा था। उस दौरान इसकी शक्ति चरम पर थी और इराक-सीरिया में कब्जा कर रखा था। इसने अफगान और तालिबान छोड़ने वाले लड़ाकों के साथ मिलकर अपनी फौज का विस्तार किया था।
शुरुआत में इसे अफगानिस्तान के पूर्वी कुनार और नंगरहार प्रांतों में चल रहे सलाफी आंदोलन का समर्थन मिला। लेकिन यह अमेरिकी सेना की मौजूदगी के कारण अपने पांव नहीं पसार पाया। पिछले साल तक तालिबान और अमेरिका के हवाई हमलों के कारण इसे भारी नुकसान झेलना पड़ा। हालांकि, तालिबान को आईएस की क्षमताओं को कम आंकने का नुकसान हुआ है। सामरिक विश्लेषक आईएस को अब भी बड़ा खतरा मानते हैं।