अयोध्या में बाबरी मस्जिद टूटने के वक्त कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे और अपनी सरकार गिरने के बाद उन्होंने उसकी जिम्मेदारी लेते हुए सुप्रीम कोर्ट तक में यही कहा कि इस घटना के लिए वह अकेले जिम्मेदार हैं, लेकिन उनके करीबी रहे कुछे अधिकारियों की अगर मानें तो वह नहीं चाहते थे कि बाबरी मस्जिद को कोई नुकसान हो। चार दिसंबर 1992 को जब तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह लखनऊ आकर उनसे मिले थे तो कल्याण सिंह ने उन्हें भरोसा दिया था कि अयोध्या में ऐसा कुछ भी नहीं होने दिया जाएगा जिससे देश के संविधान और सर्वोच्च न्यायालय की मर्यादा भंग हो, लेकिन जिस तरह विश्व हिंदू परिषद बजरंग दल आदि संगठन अयोध्या में कार सेवा को लेकर उग्र थे, उससे कल्याण सिंह को आशंका थी कि कहीं न कहीं राम मंदिर से ज्यादा उनकी सरकार गिरवाने का भी षड़यंत्र भाजपा और संघ परिवार की यथास्थितिवादी सवर्ण लॉबी कर रही है क्योंकि उसे देश के सबसे बड़े राज्य में एक पिछड़ा मुख्यमंत्री सहन नहीं हो रहा है। उन्होंने अपनी यह आशंका अपने कुछ बेहद करीबी लोगों से साझा भी की थी और भाजपा छोड़ने के बाद वह खुद इस बात को कहा करते थे। भाजपा छोड़ने के बाद जब वह मुलायम सिंह यादव के साथ आए तो अक्सर अयोध्या मुददे पर अपने बचाव में यही तर्क देते थे कि उन्हें अंधेरे में रखकर अयोध्या की घटना हुई।, लेकिन बाद में जब भाजपा में उनका पुनर्वास हो गया तो वह इस मुद्दे पर खामोश हो गए।
कल्याण सिंह पर पार्टी के भीतर पिछड़े वर्गों को जरूरत से ज्यादा तरजीह देने के आरोप भी लगे। दिलचस्प है कि भाजपा के तत्कालीन सवर्ण नेताओं ने तो हमेशा कल्याण सिंह को निशाने पर लिया ही कई पिछ़ड़े नेता भी उनके बढ़ते कद को सहन नहीं कर पाते थे। इनमें से कुछ ने तो केंद्रीय नेतृत्व से यहां तक दुहाई दी कि आखिर वो भी तो पिछड़े वर्ग से आते हैं,लेकिन कल्याण सिंह के मुकाबले उन्हें वह तरजीह क्यों नहीं मिलती, जो उन्हें दी जाती है।आगे चलकर कल्याण के पार्टी से बाहर जाने के बाद ऐसे कुछ नेता भाजपा और सरकार में शीर्ष पदों तक भी पहुंचे, लेकिन कल्याण सिंह ने कभी भी किसी तरह के विरोध की परवाह नहीं की।
मुलायम सिंह यादव के साथ उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के बावजूद बेहद गहरी दोस्ती भी थी, इसे भी तब बहुत कम लोग जानते थे, लेकिन बाद में यह सार्वजनिक हो गई। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कल्याण सिंह और मुलायम सिंह यादव दो ध्रुव बन गए थे, लेकिन 1995 से एक तीसरे ध्रुव के रूप में मायावती का उदय हुआ और इस तीसरे ध्रुव ने कल्याण और मुलायम को और भी करीब ला दिया था। 1997 में जब कल्याण को विश्वास में लिए बिना भाजपा और बसपा के बीच छह छह महीने के लिए मुख्यमंत्री पद के लिए समझौता हुआ तो इससे सबसे ज्यादा विचलित मुलायम सिंह यादव हुए। मुलायम सिंह यादव ने तब मुझसे यह कहा था कि उन्हें अब कल्याण सिंह की चिंता है क्योंकि जिस तरह भाजपा मायावती को आगे बढ़ा रही है उससे कल्याण सिंह की राजनीति की गाड़ी पटरी से उतर जाएगी। मैने कहा इससे तो आपको खुश होना चाहिए क्योंकि कल्याण सिंह ही भाजपा के अकेले नेता हैं जो आपसे मुकाबला करते हैं।तब मुलायम ने कहा था कि राजनीतिक मुकाबला अपनी जगह है, लेकिन वह कल्याण सिंह का बेहद सम्मान करते हैं और उनकी राजनीति बिगड़ने से उन्हें तकलीफ होती है। आगे चलकर कल्याण और मुलायम की दोस्ती सबके सामने आ गई ।
विवादों से भी कल्याण सिंह का नाता रहा , लेकिन वह कभी विवादों से घबराए नहीं। पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश को अपराध मुक्त करने का अभियान छेड़ा और कई कुख्यात माफिया सरगना या तो प्रदेश छोड़ गए या जेलों में बंद हो गए। कल्याण सिंह पर योगी सरकार की तरह पुलिस मुठभेड़ों को लेकर विवाद नहीं हुआ, लेकिन उनका पहला कार्यकाल कानून व्यवस्था में सुधार के लिए आज तक लोग याद करते हैं।
लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में कल्याण कानून व्यवस्था और प्रशासन के मामले में वह छाप नहीं छोड़ सके और उनके दौर में कई ऐसे नेता भाजपा में शामिल हुए या भाजपा के साथ आए जिनके खिलाफ गंभीर अपराधिक मुकदमें थे।मायावती के समर्थन वापसी के बाद कल्याण सिंह ने अपनी सरकार कांग्रेस और बसपा को तोड़कर जिस तरह बचाई थी, उससे उत्तर प्रदेश में अपराध को राजनीतिक संरक्षण का नया अध्याय भी कहा जा सकता है। पहले भाजपा यह आरोप मुलायम सिंह यादव पर लगाती थी, लेकिन बाद में उसे खुद इस मामले में रक्षात्मक होना पड़ा जब उसकी सरकार में तमाम दागी नेताओं के साथ एक ऐसे नेता ने भी मंत्री पद की शपथ ली जिसके खिलाफ एक गंभीर अपराधिक मामले में गिरफ्तारी वारंट था। राजभवन में जब यह शपथ ग्रहण हो रहा था तो वहां बैठे अटल बिहारी वाजपेयी समेत सभी वरिष्ठ भाजपा नेताओं के चेहरों पर तनाव साफ देखा जा सकता था।
अटल बिहारी वाजपेयी और कल्याण सिंह के बीच मनमुटाव
अपने दूसरे कार्यकाल में कल्याण सिंह तब भाजपा के शिखर पुरुष और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से सीधे टकराव की मुद्रा में आ गए थे। कल्याण को लगता था कि उनके खिलाफ भाजपा के तमाम सवर्ण नेताओं को वाजपेयी की शह है जबकि वाजपेयी रोज रोज लखनऊ से आने वाली शिकायतों से आजिज थे। लखनऊ से सांसद होने के नाते उनका उत्तर प्रदेश भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं और पत्रकारों से सीधा रिश्ता था। इसलिए हर छोटी बड़ी बात सीधे उन तक पहुंचती थी। यह टकराव इस कदर बढ़ गया था अफवाह तो यहां तक उड़ी कि 1999 के लोकसभा चुनावों में कल्याण सिंह न सिर्फ उत्तर प्रदेश में भाजपा को कमजोर करने में जुटे हैं बल्कि लखनऊ से अटल बिहारी वाजपेयी हार जाएं इसका इंतजाम भी कर रहे हैं। हालांकि वाजपेयी लखनऊ से जीते, लेकिन उनकी जीत का अंतर पहले के मुकाबले में खासा घट गया था और भाजपा जिसने उत्तर प्रदेश में 1998 में लोकसभा की 59 सीटें जीती थीं, घटकर 29 सीटों पर आ गई थी। इसके बाद प्रदेश भाजपा में कल्याण विरोधी नेताओं को उनके खिलाफ गोलबंदी का मौका मिल गया और फिर उन्हें पहले मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा फिर पार्टी से बाहर जाना पड़ा। कल्याण को खोने की कीमत भाजपा ने उत्तर प्रदेश खोकर चुकाई।