असम के दरंग जिले में अतिक्रमण हटाने के दौरान पुलिस के साथ लोगों की झड़क हो गई। दो लोग मारे गए और दर्जनभर घायल हुए हैं। ऑल माइनॉरिटी ऑर्गेनाइजेशन कोऑर्डिनेशन कमेटी के आह्वान पर 12 घंटे का बंद रखा गया। राज्य सरकार ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज के नेतृत्व में इस घटना की जांच कराने की बात कही है। दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने साफतौर से कह दिया है कि अतिक्रमण हटाओ अभियान नहीं थमेगा। अवैध अतिक्रमणकारियों को जमीन छोड़नी होगी। सिलचर में रह रहे प्रो. ज्योतिलाल चौधरी कहते हैं, ये 'वोट' और 'घुसपैठ' के बीच फंसे असम की कहानी है। अब 'जमीन-जंगल' ही नहीं, 'पहचान' बचाने की लड़ाई हो रही है। असम के लोगों के लिए बाहर जाने जैसी स्थिति हो गई है। एक राजनीतिक पार्टी 'घुसपैठ' कराती है तो दूसरी पार्टी की सरकार जंगल पर हुए कब्जे हटवा रही है। ऐसे में तो दरंग जैसी घटना आगे भी दोहराई जा सकती है।
प्रो. ज्योतिलाल चौधरी के अनुसार, इस तरह की घटनाओं के लिए लोगों की कोई गलती नहीं है। राजनीतिक संरक्षण में भू-माफिया और राजस्व विभाग की मिलीभगत का नतीजा है कि आज असम के लोगों को अपनी जमीन से बेदखल होना पड़ रहा है। भू-माफिया इतना ज्यादा हावी है कि वह चंद मिनटों में जमीन के नकली दस्तावेज तैयार करा देता है। असली मालिक की जगह कोई दूसरा व्यक्ति जमीन का मालिक बन जाता है। सेटलमेंट दफ्तर से भी कोई राहत नहीं मिलती। इसे यूं कह सकते हैं कि यह एक बड़ा रैकेट है। कच्छार में ऐसे अनेक पीड़ितों ने सीएम सरमा को अपनी व्यथा बताई थी। ये स्थिति पूरे असम की है। खासतौर पर बॉर्डर और नदी वाले इलाकों में तो बुरा हाल है। वहां की जमीन पर तो किसी न किसी का कब्जा रहता है।