मौसम का कहर: कई देशों में सख्त लॉकडाउन लगा, फिर भी तेज गर्मी, दिल्ली का 10 साल में सबसे गर्म दिन, जानें क्या है वजह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्रा
Updated Wed, 18 Aug 2021 03:22 PM IST
सार
वैज्ञानिकों की मानें तो पिछले दो दशकों में हुआ जलवायु परिवर्तन कठोर मौसम के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। आंकड़ों के मुताबिक, 2011-20 अब तक का सबसे गर्म दशक रहा है।
तुर्की में इसी महीने भारी गर्मी की वजह से जंगलों में आग लग गई थी, जिस पर हफ्तों काबू नहीं पाया जा सका, जबकि दिल्ली में इस अगस्त में गर्मी का नया रिकॉर्ड बना है।
- फोटो : Social Media
भारत समेत दुनिया के कई देशों ने कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए अलग-अलग समय पर सख्त लॉकडाउन लगाया था। भारत में तो पिछले साल मार्च में लगा पहले चरण का लॉकडाउन इतना सख्त था कि आम लोगों की गाड़ियां और सार्वजनिक वाहन बमुश्किल सड़कों पर नजर आते थे। यानी जीवाश्म ईंधन का कम इस्तेमाल हुआ। दूसरी लहर में भी अलग-अलग राज्यों ने लॉकडाउन लगाए। ऐसे में अंदाजा लगाया जा रहा था कि भारत में तापमान में कुछ गिरावट दर्ज की जाएगी। हालांकि ऐसा हुआ नहीं। गर्मी का कहर लगातार बढ़ता रहा।
मानसून देरी से आया और गर्म मौसम का लंबा दौर देखने को मिल रहा है। 17 अगस्त के आंकड़ों को देखा जाए तो दिल्ली में इस दिन 10 साल में सबसे ज्यादा तापमान दर्ज किया गया। यह सामान्य से चार डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा है। ऐसे में यह जानना बेहद अहम है कि लॉकडाउन के दौरान वाहनों के कम उपयोग, उद्योगों की बंदी और इंसानी गतिविधियों के कम पड़ने के बावजूद देश और दुनिया में तापमान बढ़ने की वजह क्या रही?
तुर्की में इसी महीने भारी गर्मी की वजह से जंगलों में आग लग गई थी, जिस पर हफ्तों काबू नहीं पाया जा सका, जबकि दिल्ली में इस अगस्त में गर्मी का नया रिकॉर्ड बना है।
- फोटो : Social Media
भारत समेत दुनिया के कई देशों ने कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए अलग-अलग समय पर सख्त लॉकडाउन लगाया था। भारत में तो पिछले साल मार्च में लगा पहले चरण का लॉकडाउन इतना सख्त था कि आम लोगों की गाड़ियां और सार्वजनिक वाहन बमुश्किल सड़कों पर नजर आते थे। यानी जीवाश्म ईंधन का कम इस्तेमाल हुआ। दूसरी लहर में भी अलग-अलग राज्यों ने लॉकडाउन लगाए। ऐसे में अंदाजा लगाया जा रहा था कि भारत में तापमान में कुछ गिरावट दर्ज की जाएगी। हालांकि ऐसा हुआ नहीं। गर्मी का कहर लगातार बढ़ता रहा।
मानसून देरी से आया और गर्म मौसम का लंबा दौर देखने को मिल रहा है। 17 अगस्त के आंकड़ों को देखा जाए तो दिल्ली में इस दिन 10 साल में सबसे ज्यादा तापमान दर्ज किया गया। यह सामान्य से चार डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा है। ऐसे में यह जानना बेहद अहम है कि लॉकडाउन के दौरान वाहनों के कम उपयोग, उद्योगों की बंदी और इंसानी गतिविधियों के कम पड़ने के बावजूद देश और दुनिया में तापमान बढ़ने की वजह क्या रही?
पिछले दो दशकों में कैसे बदला पृथ्वी का तापमान?
वैज्ञानिकों की मानें तो पिछले दो दशकों में हुआ जलवायु परिवर्तन कठोर मौसम के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। दरअसल, तापमान में कोई भी उछाल या गिरावट 10 सालों के औसत के आधार पर ही तय होती है। आंकड़ों के मुताबिक, 2011-20 इतिहास का अब तक का सबसे गर्म दशक रहा है। इस दौरान पृथ्वी का औसत तापमान 0.82 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है।
चौंकाने वाली बात यह है कि 2011-20 में गर्मी का औसत स्तर अचानक नहीं बढ़ा, बल्कि इस दौरान पिछले दशक यानी 2001-2010 का रिकॉर्ड टूटा था। 2001-10 में धरती का औसत तापमान करीब 0.62 डिग्री सेल्सियस बढ़ा था, जो कि तब किसी भी दशक में तापमान में आए उछाल का एक रिकॉर्ड था।
कठोर मौसम के लिए कैसे जिम्मेदार है धरती का बदलता तापमान?
वैश्विक तापमान के लगातार बढ़ने की वजह से दुनियाभर में मौसम के पैटर्न में भी बदलाव दर्ज किया गया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, आने वाले समय में गर्म लहरों और भारी बारिश की घटनाओं में काफी इजाफा हो सकता है। इसके सीधे तौर पर दो कारण हैं।
पहला- पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ रहा है और 2030 तक इसके 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने का अनुमान है। 1970 के बाद से सतह के तापमान में तेजी से वृद्धि हुई है। इसके चलते दुनियाभर में गर्म लहरें (हीटवेव) चलने से जुड़े मामले बढ़े हैं।
बीते कुछ सालों में अमेरिका से लेकर तुर्की और ऑस्ट्रेलिया से लेकर भारत के उत्तराखंड तक के जंगलों में आग लगने की घटनाओं के पीछे वैज्ञानिक इन्हीं हीटवेव्स को जिम्मेदार मानते हैं। दूसरी तरफ, पृथ्वी की सतह में तापमान बढ़ने की वजह से पूर्वी एशिया के अलावा यूरोप के ठंडे देशों में भी तापमान अपने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ रहा है। इटली के सिसिली में तो पांच दिन पहले ही तापमान 48.8 डिग्री के ऊपर पहुंच गया, जो कि पूरे यूरोप में अब तक का सबसे गर्म दिन था। इससे पहले 1977 में यूरोप के ग्रीस में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया था। इतना ही नहीं उत्तर-पूर्व भारत के कई राज्यों में मानसून के देरी के आने की वजह से कई राज्यों में सावन के महीने में भी तापमान में बड़ा उछाल दर्ज किया गया।
दूसरा- धरती के बढ़ते तापमान की वजह से उत्तर और दक्षिणी ध्रुव में भी तापमान इक्वेटर के मुकाबले दो से तीन गुना की तेजी से बढ़ा है। ऐसे में महासागरों, समुद्रों और नदियों के जलस्तर बढ़ने के साथ कई देशों में अचानक ही बाढ़ का खतरा भी पैदा हुआ है। जलवायु परिवर्तन की जानकारी रखने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी के बढ़े तापमान की वजह से भारी बारिश की स्थितियां भी लगातार पनप रही हैं, क्योंकि गर्म हवा अपने साथ ज्यादा नमी साथ लाती है। यानी पूरे वर्षा के मौसम के दौरान होने वाली बारिश अब गर्म हवाओं की वजह से एक साथ हो रही है। इससे उन क्षेत्रों में बाढ़ आ रही है, जहां पहले सामान्य वर्षा आम जनजीवन पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाती थी।
हाल ही में भारी बारिश के चलते बाढ़ से प्रभावित होने वाले देशों में सबसे ऊपर जर्मनी का नाम है। यहां 180 लोगों की मौत हो गई, जबकि कई लापता हैं। उधर, चीन में भी हाल ही में बाढ़ की वजह से कई लोगों की मौत हो गई। अमेरिका में भी हर साल चक्रवाती तूफानों की तीव्रता बढ़ती जा रही है। इससे समुद्र के किनारे बसे राज्य जैसे उत्तरी कैरोलाइना, हवाई, आदि में भारी तबाही देखने को मिली है। भारत में भी ताउते और यास जैसे चक्रवाती तूफानों ने भी उत्तर और दक्षिणी तटों पर भारी तबाही मचाई। इनकी वजह से हुई बारिश के चलते कई जगहों पर बाढ़ जैसे हालात पैदा हुए।