सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ विराग गुप्ता कहते हैं कि सिर्फ अनुच्छेद 370 की वजह से कश्मीर भारत से जुड़ा है यह कहना गलत है। भारतीय संविधान के अनेक पहलू जम्मू-कश्मीर में लागू हो गए हैं। संविधान के अनुच्छेद-356 के तहत कश्मीर में राष्ट्रपति शासन भी लगाया जा सकता है।
चुनाव आयोग, सीएजी समेत कई संवैधानिक संस्थाओं का जम्मू-कश्मीर में बराबर का अधिकार है। जम्मू-कश्मीर के हाईकोर्ट के पूर्ववर्ती फैसले से स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय जम्मू-कश्मीर में प्रभावी होते हैं।
'जनमत संग्रह और 370 को ना जोड़ें'
वहीं रक्षा मामलों के जानकार मेजर जनरल शेरू थपलियाल (रिटायर्ड) कहते हैं कि जनमत संग्रह को अनुच्छेद 370 से जोड़कर देखना ही गलत है। दरअसल 13 अगस्त 1948 के संयुक्त राष्ट्र के संकल्प के आधार पर पाकिस्तान को पहले अपनी सेना पीछे हटानी थी। पूरा कश्मीर भारत को सौंपना था।
फिर जब स्थितियां सामान्य हो जातीं, तब संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में पूरे पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) सहित जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह होता। लेकिन पाकिस्तान ने इन शर्तों को नहीं माना। ऐसे में आज की स्थिति में जनमत संग्रह का सवाल ही नहीं उठता।
बढ़ेगा रोजगार
वहीं कुछ जानकारों का मानना है कि अनुच्छेद 370 नहीं होती तो कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर में जमीन खरीद पाता। इससे वहां निवेश आता, रोजगार आते। सेंटर फॉर दी स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज की पूर्व प्रोफेसर मधु किश्वर कहती हैं कि अनुच्छेद 370 का फायदा उठाकर अलगाववादी ताकतें कश्मीर को नया पाकिस्तान बनाना चाहती हैं। युवाओं के कई संगठन भी लंबे समय जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की मांग करते रहे हैं।
क्या है अनुच्छेद 370
भारतीय संविधान की अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करती है। अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का एक विशेष अनुच्छेद यानी धारा है, जो जम्मू-कश्मीर को भारत में अन्य राज्यों के मुकाबले विशेष अधिकार प्रदान करती है। भारतीय संविधान में अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध सम्बन्धी भाग 21 का अनुच्छेद 370 जवाहरलाल नेहरू के विशेष हस्तक्षेप से तैयार किया गया था।
कैसे हुआ भारत में विलय
1947 में विभाजन के समय जब जम्मू-कश्मीर को भारतीय संघ में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हुई तब जम्मू-कश्मीर के राजा हरिसिंह स्वतंत्र रहना चाहते थे। इसी दौरान तभी पाकिस्तान समर्थित कबिलाइयों ने वहां आक्रमण कर दिया जिसके बाद बाद उन्होंने भारत में विलय के लिए सहमति दी।
कैसे बनी 370
उस समय की आपातकालीन स्थिति के मद्देनजर कश्मीर का भारत में विलय करने की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करने का समय नहीं था। इसलिए संघीय संविधान सभा में गोपालस्वामी आयंगर ने धारा 306-ए का प्रारूप पेश किया। यही बाद में अनुच्छेद 370 बनी। जिसके तहत जम्मू-कश्मीर को अन्य राज्यों से अलग अधिकार मिले हैं।
सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि अनुच्छेद 370 अस्थायी या स्थायी
अप्रैल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 को लेकर कहा था कि सालों से बने रहने के चलते अब यह धारा एक स्थायी प्रावधान बन चुकी है, जिससे इसको खत्म करना असंभव हो गया है। वैसे अब सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई के लिए तैयार है। कोर्ट जिस याचिका पर सुनवाई करेगा, उसमें तर्क दिया गया है कि यह धारा संविधान के भाग 21 के तहत एक प्रावधान है। इसके शीर्षक में ही अस्थायी प्रावधान होना लिखा था। यह स्थायी नहीं है।
इस विवाद का दूसरा पहलू यह है कि अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा द्वारा साल 1951 से 1956 के दौरान बनाया गया था। मगर जनवरी 1957 में यह सभा भंग कर दी गई। क्योंकि उस वक्त यह मान लिया गया था कि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय होने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।
ऐसे में तर्क दिया जाता है कि अनुच्छेद 370 तभी खत्म हो सकती है, जब एक नई संविधान सभा चुनी जाए और वह इसे खत्म करने संबंधी सहमति प्रदान करे। मगर दूसरे पक्ष का मानना है कि 26 जनवरी 1957 को जम्मू-कश्मीर संविधान सभा के भंग होने के साथ अनुच्छेद 370 को भी खत्म हो जाना था।
अनुच्छेद 370 पर संविधान संशोधन पर भी सवाल
संविधान में संशोधन कर इस धारा को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव पास होना जरूरी है। अगर यह पास हो भी जाता है तो मौजूदा कानून के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार से भी सहमति लेनी होगी।
लेकिन मौजूदा सरकार के कार्यकाल में लोकसभा का आखिरी सत्र भी पूरा हो चुका है और जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू है। जम्मू-कश्मीर की दो बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां भी अनुच्छेद 370 हटाए जाने की विरोधी हैं।
हालांकि भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी कहते हैं कि अनुच्छेद 370 हटाने के लिए संसद में कानून बनाने की जरूरत नहीं है। राष्ट्रपति एक अधिसूचना जारी कर इस धारा को खत्म कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने दिसंबर 2013 में जम्मू में एलान किया था कि अनुच्छेद 370 पर देश भर में बहस होनी चाहिए। फिर पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के अपने घोषणा-पत्र में वादा किया था कि अनुच्छेद 370 को हटाया जाएगा। लेकिन चुनावों में मिली अभूतपूर्व जीत और पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद भी भाजपा ना संसद में इस मुद्दे पर बोली और ना ही जनता के बीच।
मार्च 2015 में जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाने के बाद तो केंद्र सरकार ने जैसे इस मुद्दा को छोड़ ही दिया। वैसे भाजपा अनुच्छेद 370 को साल 1996, 1999 और 2004 के लोकसभा चुनावों से पहले भी उठा चुकी है।
लेकिन सत्ता में आने के बाद भाजपा, साल 1999 से 2004 तक और फिर 2014 से लेकर अब तक, इस मुद्दे पर चुप है। पुलवामा हमले के बाद लोगों के आक्रोश के मद्देनजर कुछ भाजपा नेता जरूर इसके खिलाफ बोल रहे हैं।
सरकार 370 पर आरटीआई का भी जवाब नहीं दे रही
पिछले साल 30 जुलाई को सूचना अधिकार कार्यकर्ता नीरज शर्मा ने एक सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से साल 2014 से 2018 के बीच अनुच्छेद 370 को हटाने को लेकर हुई कोशिशों के बारे में पूछा था। लेकिन सरकार ने इस पर कोई जानकारी नहीं दी। शर्मा ने 7 अक्टूबर 2018 को दूसरी आरटीआई लगाई। 6 नवंबर को पीएमओ की ओर से कहा गया कि जानकारी इकट्ठा की जा रही है।
जब कोई सूचना नहीं दी गई तो आवेदनकर्ता ने सूचना अधिकार कानून के तहत प्रथम अपील अधिकारी को आवेदन दिया। 30 दिसंबर को प्रथम अपील अधिकारी ने आदेश जारी कर कहा कि 15 दिन के भीतर अपीलकर्ता को जवाब दिया जाए। मगर उस आदेश के लगभग दो महीने बाद भी कोई जवाब नहीं आया है।