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वायु प्रदूषण: क्या लॉकडाउन लगने से ले पाएंगे खुली हवा में सांस, विशेषज्ञों से समझिए क्या है स्थायी समाधान

प्रतिभा ज्योति
Updated Mon, 15 Nov 2021 03:09 PM IST

सार

दिल्ली- एनसीआर में वायु प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता बनी हुई है। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट दिल्ली सरकार पर सख्त है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से कहा कि हम चाहते हैं कि प्रदूषण कम हो। हम यहां आपको हर कदम के लिए सलाह नहीं दे सकते। कारखानों, ट्रैफिक को कंट्रोल करना आपका काम है। 
 
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दिल्ली में वायु प्रदूषण - फोटो : अमर उजाला
सर्दियों के सीजन में भारत में हर साल दिल्ली समेत पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में प्रदूषण की समस्या बढ़ जाती है। इस बार भी दिवाली खत्म होते ही प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच गया। राजधानी दिल्ली में दम घोंट रहे प्रदूषण के मामले पर आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। इससे पहले दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट ने एक एफिडेविट दायर कर कहा कि वह दिल्ली में लॉकडउन लगाने को तैयार है लेकिन यह कारगार तभी होगी जब इसे पूरे एनसीआर में लागू किया जाए। 

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले दिल्ली सरकार ने अपने एफिडेविट में कहा वह 2016 से ग्रेडिड रेस्पॉन्स एक्शन प्लान पर काम कर रही है। इसके अलावा सरकार ने ऑड-इवन योजना भी चलाई थी। दिल्ली में पहली बार 01-15 जनवरी 2017 को लगाई गई थी। दिल्ली में यह योजना तीन बार लागू हो चुकी है। 




स्मॉग टावर भी लगाए गए।
इसके अलावा दिल्ली में प्रदूषण रोकने के लिए स्मॉग टावर भी लगाए गए हैं। कनॉट प्लेस में दिल्ली का पहला स्मॉग टावर लगाया गया जिसने इसी साल सितंबर- अक्तूबर महीने से काम करना शुरू कर दिया है। इसमें लगे 5000 फिल्टर हवा के साफ करके सांस लेने लायक हवा छोड़ते हैं। इस टॉवर का उद्घाटन अगस्त में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने किया।

सरकार का दावा है कि अमेरिकी तकनीक से बना यह स्मॉग टावर हवा में प्रदूषण की मात्रा को कम करता है। लेकिन फिर भी दिल्ली में हालात जस के तस हैं।  अब इस मसले पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। इसी सिलसिले में हमने कुछ विशेषज्ञों की मदद से यह जानने की कोशिश की है कि दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की मुख्य वजह क्या है और इसे रोकने का स्थायी समाधान क्या है?
 
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दिल्ली में वायु प्रदूषण - फोटो : अमर उजाला
सर्दियों के सीजन में भारत में हर साल दिल्ली समेत पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में प्रदूषण की समस्या बढ़ जाती है। इस बार भी दिवाली खत्म होते ही प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच गया। राजधानी दिल्ली में दम घोंट रहे प्रदूषण के मामले पर आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। इससे पहले दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट ने एक एफिडेविट दायर कर कहा कि वह दिल्ली में लॉकडउन लगाने को तैयार है लेकिन यह कारगार तभी होगी जब इसे पूरे एनसीआर में लागू किया जाए। 

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले दिल्ली सरकार ने अपने एफिडेविट में कहा वह 2016 से ग्रेडिड रेस्पॉन्स एक्शन प्लान पर काम कर रही है। इसके अलावा सरकार ने ऑड-इवन योजना भी चलाई थी। दिल्ली में पहली बार 01-15 जनवरी 2017 को लगाई गई थी। दिल्ली में यह योजना तीन बार लागू हो चुकी है। 



स्मॉग टावर भी लगाए गए।
इसके अलावा दिल्ली में प्रदूषण रोकने के लिए स्मॉग टावर भी लगाए गए हैं। कनॉट प्लेस में दिल्ली का पहला स्मॉग टावर लगाया गया जिसने इसी साल सितंबर- अक्तूबर महीने से काम करना शुरू कर दिया है। इसमें लगे 5000 फिल्टर हवा के साफ करके सांस लेने लायक हवा छोड़ते हैं। इस टॉवर का उद्घाटन अगस्त में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने किया।

सरकार का दावा है कि अमेरिकी तकनीक से बना यह स्मॉग टावर हवा में प्रदूषण की मात्रा को कम करता है। लेकिन फिर भी दिल्ली में हालात जस के तस हैं।  अब इस मसले पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। इसी सिलसिले में हमने कुछ विशेषज्ञों की मदद से यह जानने की कोशिश की है कि दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की मुख्य वजह क्या है और इसे रोकने का स्थायी समाधान क्या है?
 

दिल्ली में वायु प्रदूषण - फोटो : ANI
प्रदूषण बढ़ाने वाले कारणों को जानिए
आईआटी कानपुर के प्रोफेसर सच्चिदानंद त्रिपाठी बताते हैं कि दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण बढ़ने को केवल दिवाली से लिंक करना सही नहीं होगा। दिल्ली-एनसीआर में सर्दी के साथ प्रदूषण की स्थिति खराब होने लगती है। पंजाब-हरियाणा में यदि पराली ज्यादा नहीं भी जले तो भी प्रदूषण की स्थिति खराब हो जाती है। 2012 में जब ज्यादा पराली नहीं जला तब भी प्रदूषण के हालात ऐसे ही थे। लेकिन जैसे ही पराली जलना शुरू होता है तो स्थिति खराब होने लगती है। ऐसे कई कारण हैं जिस पर दिल्ली और एनसीआर में करने की जरूरत है जिससे प्रदूषण को रोका जा सके। हमें योजनाबद्ध तरीके से प्रदूषण बढाने वाले कारकों को दूर करने की जरूरत है।
 
वे मानते हैं कि वायु प्रदूषण को रोकने के लिए लांग-टर्म और शॉर्ट टर्म समाधान निकालने की जरूरत है क्योंकि प्रदूषण की वजह से दिल्ली, एनसीआर, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और यहां तक की बिहार तक में हालात बिगड़ने लगते हैं। इसिलए हमें लांग टर्म समाधान के बारे में ज्यादा सोचना चाहिए। जैसे  वायु प्रदूषण रोकने के लिए इंडस्ट्री और ट्रैफिक की तरफ देखिए जिनकी प्रदूषण बढ़ाने में अहम भूमिका होती है। इंडस्ट्री से निकलने वाले जहरीले पदार्थों पर रोक लगाने के लिए व्यापक तरीके अपनाने होंगे जिस पर इंडस्ट्री को इस मुद्दे पर साथ में लाना होगा।  

दूसरी तरफ दिल्ली-एनसीआर में चलने वाले वाहन हवा की गुणवत्ता को सर्दियों में खराब करने वाला सबसे बड़े कारक हैं। ऐसी कई पुरानी गाड़ियां जो डीजल और पेट्रोल से चल रही हैं उससे ज्यादा प्रदूषण फैलता है। नई गाड़ियों में प्रदूषण रोकने के उपाय किए जा रहे हैं लेकिन पुरानी गाड़ियों में यह उपाय नहीं पाया जाता है। इसलिए ऐसे वाहनों पर रोक लगाने के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक गाड़ियों के चलन को भी बढ़ावा देना चाहिए।   
 

जलती पराली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
प्रदूषण पर स्थायी रोक लगाने के उपाय क्या
प्रो त्रिपाठी मानते हैं प्रदूषण पर स्थायी रोक लगाने के लिए अलग-अलग राज्यों के लिए अलग-अलग मानकों को अपनाने की जरूरत है क्योंकि सभी राज्यों की समस्याएं एक-दूसरे से अलग हैं। वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में परिवहन, खाना पकाने के लिये बायोमास जलाना, बिजली उत्पादन, उद्योग, निर्माण और पराली जलाना आदि शामिल हैं। इसलिए खतरनाक वायु प्रदूषकों के लिए राष्ट्रीय उत्सर्जन मानक पूरे देश में एक समान लागू करना ठीक नहीं है। दिल्ली, एनसीआर, उत्तर प्रदेश पंजाब और हरियाणा के लिए अलग उत्सर्जन कानून बनाने की जरूरत है। जैसे कैलिफोर्निया में अमेरिका के दूसरे राज्यों के मुकाबले ज्यादा सख्त उत्सर्जन कानून लागू है। हम भी उस मॉडल को अपना सकते हैं।  

उनका कहना है कि इन सभी उपायों पर यदि सरकारें लगातार दस साल तक काम करे तो अच्छे परिणाम आ सकते हैं। चीन ने किया था 2008 में बीजिंग ओलंपिक से पहले प्रदूषण रोकने के लिए कई उपाय किए गए थे। कुछ सालों में ही वहां अच्छे परिणाम निकले। 

प्रदूषण रोकने के लिए कोई पॉलिसी नहीं
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व वैज्ञानिक और पर्यावरणविद महेंद्र पांडेय का कहना है कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब प्रदूषण खतरनाक स्थिति में पहुंच जाता है तब उसे कंट्रोल करने की बात होती है। प्रदूषण रोकने के लिए किसी के पास कोई ठोस नीति नहीं है। वहीं इसके पीछे की दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि सरकारों को यह पता ही नहीं कि प्रदूषण का असली स्रोत क्या है, सबसे ज्यादा कहां से प्रदूषण कहां से पैदा होता है। इसके लिए कभी दिवाली तो कभी पराली को दोष दिया जाता है। अभी हाल ही में आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे ज्यादा प्रदूषण वाहनों से होता है। लेकिन इस पर बातें कम की जाती है। जब हमें प्रदूषण पैदा करने वाले मुख्य कारक या उसके स्रोत के बारे में ही नहीं पता है तो फिर उसे कंट्रोल करने की बात कहां से आती हैं। 

 

दिल्ली में लॉकडाउन (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई
हर बार अक्तूबर-नवंबर में होता है वार्षिक कार्यक्रम
उनके मुताबिक हर बार दिवाली के बाद प्रदूषण बढ़ता है और इसके लिए पंजाब, हरियाणा या उत्तर प्रदेश में जलने वाली पराली को दोष ठहराया जाता है। सरकारें एक-दूसरे को जिम्मेवार ठहराने लगती हैं। मुझे समझ नहीं आता कि पराली चाहे देश के किसी भी हिस्से में जलती है तो उसे क्यों दिल्ली के प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है? इसकी एक बड़ी वजह यह है कि सरकारें प्रदूषण के रोकथाम के लिए साल भर काम नहीं करती, साल भर सक्रिय नहीं रहती।

हर साल अक्तूबर-नवबंर का महीना आते ही जैसे सर्दी शुरू होती है और प्रदूषण बढ़ने लगता है, तब सुप्रीम कोर्ट भी जागता है और बाकी एजेंसियां भी तब सक्रिय हो जाती है। यह वार्षिक कार्यक्रम जैसा हो गया है।  पराली के नाम पर। वार्षिक एवेंट की तरह है। एवेंट मैनेजमेंट की तरह इसे डील किया जाता है। तब सुप्रीम कोर्ट की भी नींद टूटती है और सरकारी एजेंसियां उठती है। जब तक फटकार लगती है तब तक प्रदूषण स्तर कम होने लगता है और मामला ठंडा पड़ जाता है। 

क्या लॉकडाउन लगाना सही कदम होगा
साल 2020 में कोरोना वायरस के चलते लगे लॉकडाउन की वजह से कई शहरों में प्रदूषण के स्तर में गिरावट देखने को मिली थी। दिल्ली सरकार प्रदूषण रोकने के लिए इस बार भी लॉकडाउन लगाने को तैयार है लेकिन प्रोफेसर त्रिपाठी प्रदूषण के कारण लॉकडाउन लगाने को ज्यादा फायदेमंद नहीं मानते। ऑड-इवन के बारे में उनका मानना है कि यह प्रयोग भी ज्यादा सफल नहीं हुआ क्योंकि इसके क्रियान्वयन की समस्या आती है। 

वहीं पर्यावरणविद महेंद्र पांडेय भी लॉकडॉउन लगाने को स्थायी समाधान नहीं मानते हैं। उनका कहना है तीन-चार सार पहले दिल्ली सरकार ने प्रदूषण से निपटने के लिए ग्रेडिड रिस्पांस एक्शन पॉलिसी लेकर आई थी, उसका क्या फायदा हुआ यह भी बताया जाए। 



   


 

चीन की राजधानी बीजिंग में कई ऊंची इमारतें प्रदूषण की घनी धुंध की वजह से नजर ही नहीं आईं (फाइल फोटो) - फोटो : Social Media
हालांकि विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि दिल्ली में जब भी प्रदूषण की समस्या बढ़ती है तो इसका एक मुख्य कारण मौसमी परिस्थितियां होती हैं। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रलय की विशेषज्ञ समिति के सदस्य पर्यावरण विज्ञानी डा. डी. साहा के एक बयान के मुताबिक मौसम विभाग ने दिवाली के कई दिन पहले ही पूर्वानुमान जारी कर कहा था दीपावली के दिन से हवा की दिशा उत्तर-पश्चिमी हो जाएगी जिसकी वजह से इस दिशा से आने वाली हवा से प्रदूषण में इजाफा होता है। यह भी बताया गया था कि दीपावली से अगले तीन दिन तक हवा की रफ्तार बहुत ज्यादा नहीं रहेगी। ऐसे में वायु गुणवत्ता बहुत खराब से गंभीर श्रेणी तक पहुंच सकती है।

चीन ने प्रदूषण रोकने के क्या उपाय किए
IQAir ने साल 2020 विश्व वायु गुणवत्ता की रिपोर्ट में पाया है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे प्रदूषित देश है। जबकि दिल्ली को दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी चुनी गई। 2020 में बांग्लादेश दुनियाभर में सबसे प्रदूषित देश था। इसके बाद दूसरे नंबर पर पाकिस्तान था। लेकिन 2013 से पहले चीन में वायु प्रदूषण के हालात काफी खराब थे। दिल्ली-एनसीआर की   तरह वहां के बड़े शहरों में धुंध छाई रहती थी। लेकिन 2013 में चीन ने वायु प्रदूषण को घटाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास शुरू किए जिससे अब हालात में काफी सुधार है। 

चीन ने 2013 में नेशनल एक्शन प्लान ऑन एयर पॉल्यूशन लागू किया। चीन में औद्योगिक कामों को घटाया गया। कई कोयला खदानें भी बंद कर दी गईं। ऐसे कारखाने जो जहरीले पदार्थ छोड़ रहे थे उन्हें उत्तर चीन और पूर्वी चीन से दूसरे स्थानों पर ले जाया गया या बंद कर दिया गया। पुरानी गाड़ियों को सड़कों से हटाया गया और बीजिंग, शंघाई और गुआंगझोऊ में सड़कों पर कारों की संख्या कम कर दी गई। बड़े शहरों में बड़े-बड़े एयर प्यूरीफायर लगाए गए। बड़े शहरों में लो कॉर्बन पार्क यानी उन इलाकों का विकास किया गया जो कम कॉर्बन का उत्सर्जन कर सके। चीन में कई इलेक्ट्रिक पेड़ लगाए गए हैं जो हवा से कार्बन डाइऑक्साइड और बैक्टीरिया को हटाने के लिए उपयोगी हैं।

 

जापान - फोटो : Japan Times
जापान वायु प्रदूषण से कैसे निपट रहा है
जापान ने 1970 के दशक में अपनी प्रदूषण की समस्या से निपटना शुरू किया, जब हवा में कणों का स्तर (पीएम2.5) सभी प्रमुख शहरों के आसपास खतरनाक रूप से उच्च स्तर पर पहुंच गया था। 19वीं शताब्दी में मीजी काल के दौरान तेजी से औद्योगीकरण के कारण जापान में यह समस्या बढ़ी। 

जापान ने प्रदूषण से निपटने के लिए इन उपायों को अपनाया। जैसे स्थानीय सरकार अपनी आवश्यकताओं को देखते हुए राष्ट्रीय नीति में बदलाव कर मानकों को कड़ा कर सकती है, पर्यावरण के अनुकूल प्रौद्योगिकी और नीति अपनाने के लिए व्यवसायों को प्रोत्साहित किया गया,  पुराने और अक्षम बिजली स्टेशनों और कारखानों का आधुनिकीकरण किया गया, सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण प्रौद्योगिकी में निवेश किया, ऑटोमोबाइल इंजन के दहन में सुधार करना और जनता और बिजनेस कम्युनिटी दोनों को शिक्षित किया गया।

 
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