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CJI: 'खत्म हो तारीख पर तारीख की संस्कृति, लोगों के मरने का इंतजार न करें', न्यायाधीशों से बोले सीजेआई

Sat, 02 Mar 2024 10:49 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अहमदाबाद

सार

CJI: सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि आम नागरिक मानते हैं कि तारीख पर तारीख की संस्कृति न्यायिक प्रणाली का हिस्सा बन गया है। उन्होंने कहा कि यह संस्कृति वादियों की पीड़ा को बढ़ा सकती है और बैकलॉग के चक्र को कायम रख सकती है।
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सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
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देश की न्यायिक प्रणाली में सुनवाई के लिए तारीख पर तारीख की प्रचलित संस्कृति वादियों की पीड़ा को बढ़ाती है। अदालतों को मामलों का फैसला करने के लिए नागरिकों के मरने का इंतजार नहीं करना चाहिए। शीर्ष अदालत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ ने शनिवार को यह बात कही। 

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उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि लंबे समय से चले आ रहे 'जमानत नियम है, जेल अपवाद है' का सिद्धांत कमजोर होता जा रहा है, क्योंकि जिला अदालतें व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों से निपटने में हिचकिचा रही हैं। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ गुजरात के कच्छ जिले के धोरडो में 'अखिल भारतीय जिला न्यायाधीश सम्मेलन' में बोल रहे थे। 

उन्होंने आगे कहा कि लंबित मामलों की संख्या और लंबित मामले न्याय के कुशल प्रशासन के लिए एक चुनौती पेश करते हैं। एक प्रमुख मुद्दा स्थगन की संस्कृति का है। कार्यवाही में देरी के लिए बार-बार अनुरोध करने वाले इस अभ्यास का हमारी कानूनी प्रणाली की दक्षता और अखंडता पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है। 
 

सीजेआई ने कहा, आम नागरिक मानते हैं कि स्थगन की यह संस्कृति न्यायिक प्रणाली का हिस्सा बन गया है। उन्होंने कहा कि यह संस्कृति वादियों की पीड़ा को बढ़ा सकती है और बैकलॉग के चक्र को कायम रख सकती है। चंद्रचूड़ ने कहा, हमें अपने नागरिकों के मरने का इंतजार नहीं करना चाहिए। उनके मामलों का फैसला होना चाहिए। 

उन्होंने कहा कि लंबित मामलों की समस्या के लिए प्रणालीगत सुधारों और प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल सहित बहुआयामी दृष्टिकोण की जरूरत है। अदालती प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करने, मामलों के निपटारे में तेजी लाने और वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को बढ़ावा देने में जिला न्यायाधीश की भूमिका महत्वपूर्ण है। 
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उन्होंने कहा कि इस बात की आशंका बढ़ रही है कि जिला अदालतें व्यक्तिगत आजादी से जुड़े मामलों पर विचार नहीं करना चाहती हैं। लंबे समय से चला आ रहा सिद्धांत 'जमानत नियम है, जेल अपवाद है' अपनी जमीन खो रहा है। यह उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचने वाले मामलों की बढ़ती संख्या स्पष्ट है। क्योंकि निचली अदालत द्वारा जमानत खारिज किए जाने के बाद अपील की जाती है। उन्होंने कहा कि इस प्रवृत्ति का गहराई से मूल्यांकन जरूरी है। 
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