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84 के दंगे: जब राजीव गांधी ने कहा- जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है

Mon, 17 Dec 2018 05:17 PM IST
अमर शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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इंदिरा गांधी के अंतिम दर्शन करने उमड़े लोग
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34 साल बाद आखिरकार कांग्रेस नेता सज्जन कुमार सिख विरोधी दंगों के दोषी करार दिए गए और दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। 31 अक्टबूर 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजधानी दिल्ली समेत देश के अन्य राज्यों उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में सिख विरोधी दंगों में 3325 लोग मारे गए थे। जिसमें 2733 सिर्फ दिल्ली में मारे गए थे। 
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आजाद भारत में हुए इस कत्लेआम के बाद 19 नवंबर को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दिल्ली बोट क्लब में इकट्ठा भीड़ के सामने कहा, "जब इंदिरा जी की हत्या हुई थी, तो हमारे देश में कुछ दंगे-फसाद हुए थे। हमें मालूम है कि भारत की जनता को कितना क्रोध आया, कितना ग़ुस्सा आया और कुछ दिन के लिए लोगों को लगा कि भारत हिल रहा है। जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है।" 

बयान से फैली सनसनी

प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य में दंगों के दौरान अनाथ और बेघर हो गए उन हजारों सिखों का कोई जिक्र नहीं था। ऐसा लगा मानो उनके जख्मों पर नमक छिड़का जा रहा हो। आम लोगों में यह संदेश गया, 'मानो इन हत्याओं को जायज ठहराने की कोशिश की गई।' 

इस बयान ने उस समय और आने वाले काफी समय तक खूब सनसनी मचाई और विपक्ष ने इसे अपने पक्ष में खूब भुनाया। कांग्रेस पार्टी को इस बयाव को सही ठहराने में अभी भी काफी बचाव करनी पड़ता है। 
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सिख विरोधी दंगों की पृष्ठभूमि पर कुछ साल पहले एक किताब छपी थी- 'व्हेन ए ट्री शुक डेल्ही।' इस किताब में सिख विरोधी दंगों के दौरान समाज की डरानेवाली सच्चाई और पीड़ितों के परिजनों का दर्द उकेरा गया है। साथ ही यह किताब राजनेताओं के साथ पुलिस के गठजोड़ का भी पर्दाफाश करती है। 

सबसे पहले क्या हुआ

इंदिरा गांधी की हत्या की खबर आग की तरह फैल गई। तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह उत्तरी यमन की अपनी यात्रा पूरी होने से पहले ही दिल्ली लौटे आए। हिंसा की शुरुआत उस समय हुई थी जब जैल सिंह हवाई अड्डे से इंदिरा गांधी के दर्शन करने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जा रहे थे। एम्स से कुछ पहले आरके पुरम के पास उनके वाहन काफले पर स्थानीय लोगों ने जलती मशालें फेंक दी थी। 

तरलोचन सिंह जैल सिंह के तत्कालीन प्रेस अधिकारी थे। वे बाद में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष बने। तरलोचन के मुताबिक, "ज्ञानी जी की कार सबसे आगे थी। उनके पीछे सचिव और उसके पीछे मेरी कार थी। आरके पुरम इलाके में आगे की दोनों कारें निकल गईं। मेरी कार के सामने जलती मशालें लेकर कुछ लोग आ गए और हमारे ऊपर मशालें फेंकी गईं। लेकिन ड्राइवर ने किसी तरह से बचाकर मुझे घर तक पहुंचाया।" 

वह बताते हैं, "ज्ञानी जी जैसे ही इंदिरा जी के दर्शन करके एम्स से नीचे उतरे, लोगों ने उन्हें घेर लिया और उनकी कार को रोकने की कोशिश की। ज्ञानी जी के सुरक्षाकर्मियों ने बड़ी जद्दोजहद के बाद उन्हें वहां से सुरक्षित निकाला।" 

कभी नहीं भूलने वाला वो मंजर

indira gandhi assassination
भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के साथ जो हुआ यह तो महज शुरुआत थी। इसके बाद देश उस मंजर का गवाह बना जिसके बारे में किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। 

त्रिलोकपुरी के ब्लॉक नंबर 32 में 320 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। वहां पहुंचने की कोशिश करनेवाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को भी वहां पहुंचने नहीं दिया गया क्योंकि उस ब्लॉक के रास्ते में हजारों लोग जमा थे। 

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि ब्लॉक नंबर 32 की उस ढाई सौ गज लंबी गली में लोगों की लाशें और कटे हुए अंग बिखरे हुए थे। गली में कहीं पैर रखने तक की जगह नहीं थी और चलना तक मुश्किल था। शाम के वक्त भी उस इलाके को करीब 10 हजार लोगों ने घेरा रखा था और चारों ओर सन्नाटा पसरा था।

सिख विरोधी दंगों के बाद पीड़ितों की ओर से न्याय की लड़ाई लड़ने वाले वकील और "व्हेन ए ट्री शुक डेल्ही" के सह-लेखक हरविंदर सिंह फूल्का बताते हैं कि पुलिस ने सिखों को बचाने के बजाए उन्हीं के खिलाफ कार्रवाई की थी। वे कहते हैं कि कल्याणपुरी थाने में तकरीबन 600 लोगों को मारा गया। ज्यादातर लोगों को पहली नवंबर को मारा गया। पुलिस ने वहां 25 लोगों को हिरासत में लिया था और वे सभी सिख थे। 

फूलका का कहना है कि, "एक और दो नवंबर को इनके अलावा पुलिस ने किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया। पुलिस ने सिखों को पकड़कर भीड़ के हवाले कर दिया।" 

कैसे मचा इतना बड़ा कत्लेआम

सिख समुदाय के लोगों का इतने बड़े पैमाने पर हुए इस कत्लेआम के बाद यह सवाल उठा कि यह भीड़ का आक्रोश था या इसके लिए पीछे षड्यंत्र था। "व्हेन ए ट्री शुक डेल्ही" किताब के लेखक मनोज मित्ता का कहना है कि पूरे कत्लेआम के पीछे चंद नेताओं का दिमाग था। 

मित्ता के मुताबिक इंदिरा गांधी की हत्या वाले दिन को हिंसा की छिटपुट घटनाएं हुई। उस दिन कोई सिख नहीं मारा गया। लेकिन इसके बाद एक और दो नवंबर को जो घटा वह बिना योजना के नहीं हो सकता था। मित्ता कहते हैं कि कत्लेआम की शुरुआत पूरे 24 घंटों के बाद यानी अगले दिन एक नवंबर से हुई थी। 

मित्ता का कहना है कि नेताओं ने अपने क्षेत्रों में बैठक कर हिंसा की योजना बनाई और अगले दिन हथियारों के साथ निकले थे। पुलिस उन्हें नजरअंदाज कर रही थी। यहां तक की उनकी मदद कर रही थी। 

फूल्का कहते हैं, "भीड़ के पास सूचीबद्ध जानकारी थी कि किस घर में सिख रहते हैं। लोगों को हजारों लीटर केरोसीन और ज्वलनशील पाउडर मुहैया कराया गया। जो लोहे की छड़ें लोगों के हाथों में थी, वे एक जैसी थीं।" 
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महत्वाकांक्षी पुलिसवाले बने खिलौना

indira gandhi
सबसे अहम सवाल यह है कि जब पुलिस ने दंगा रोकने की बजाए उसे बढ़ाने में क्यों मदद की। रक्षक भक्षक क्यों बन गए। पुलिस नेताओं के हाथों में खिलौना क्यों बन गई। 

1984 के सिख विरोधी दंगों में पुलिस की भूमिका की जांच करने वाले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वेद मारवाह कहते हैं कि पुलिस शासन व्यवस्था में एक औजार होती है। शासन इसका जैसा चाहे वैसा इस्तेमाल कर सकता है। मारवाह के मुताबिक जो पुलिस अधिकारी बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी होते हैं उनकी नजरें इस बात पर होती है कि राजनेता उनसे क्या चाहते हैं। वो इशारों में बात समझते हैं। वे किसी लिखित या मौखिक आदेश का इंतजार नहीं करते। 

मारवाह के मुताबिक पुलिस ने जिन इलाकों में नेताओं की बात मानने से इनकार कर दिया वहां कोई दंगा नहीं हुआ। वे चांदनी चौक इलाके का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वहां बड़ा गुरुद्वारा है। वहां स्थिति नियंत्रण में रही क्योंकि उस समय तत्कालीन पुलिस उपायुक्त मैक्सवेल परेरा ने इसके कड़े निर्देश दिए थे कोई गड़बड़ी हो। दंगाई उन्हीं इलाकों में उत्पात मचा पाए जहां पुलिस नेताओं के इशारों पर नाच रहे थे। 

मनमोहन ने मांगी माफी

सिख विरोधी दंगों के 21 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में इसके लिए माफी मांगी और कहा कि जो कुछ भी हुआ, उससे उनका सिर शर्म से झुक जाता है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या माफी मांग लेने भर से आजाद भारत के सबसे निर्मम हत्याकांड की यादें मिट सकती हैं? 

पूर्व कानून मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद कहते हैं कि इसका जबाव तो वही दे सकता है जो न्याय की अपेक्षा करता है। मैं कहूं कि न्याय मिल गया है तो वे कहेंगे कि आपने दर्द देखा ही कहां हैं? आप कैसे कह सकते हैं कि न्याय मिला या नहीं मिला? जिसने चोट खाई है, जिसे दर्द हुआ है, वही इसका जबाव दे सकता है।" 

लेकिन आजाद भारत में सिर्फ 1984 में ही निर्मम दंगे नहीं हुआ। साल 1988 में भागलपुर दंगा, साल 1992-93 में मुंबई दंगा और साल 2002 में गुजरात दंगा। कुछ दिनों पहले यूपी में दंगा। बड़ा सवाल यह है कि दंगा के कितने आरोपियों को सजा मिली। शायद यही वजह है कि इस तरह की घटनाएं आज भी होती रहती हैं। 
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