आजादी की लड़ाई में बुनकरों का अहम योगदान रहा है। अंग्रेजों ने आर्थिक गुलामी से शुरुआत की थी। उस वक्त 30 करोड़ की आबादी थी, स्थानीय बुनकरों की मेहनत से अपने देश के लोगों का तन अच्छे से ढक रहा था। अंग्रेजों से सबसे पहले हथकरघा शैली पर कुठाराघात किया। इंग्लैंड से कपड़ा तैयार कर उसे भारतीयों पर थोपा जाने लगा। तब महात्मा गांधी ने अपने बुनकरों को आगे किया।
जेएनयू में समाजशास्त्र के प्रोफेसर रहे आनंद कुमार बताते हैं कि गांधी जी ने अंग्रेजों की पैदा की गई आर्थिक गुलामी का तोड़ बुनकरों के जरिए ही निकाला था। देखते ही देखते खादी राष्ट्रीय पोशाक बन गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात नवनिर्वाचित सरकार ने औद्योगिकीकरण का रास्ता अपनाया।
गांधी जी की कई शिक्षाओं को किनारे करने का प्रयास हुआ। चूंकि उस वक्त सरकार में बहुत से लोग वही थे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में गांधी जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। वे बुनकरों के योगदान को पूरी तरह नहीं भूले थे। 200 वर्षों के औपनिवेशिक शासन के दौरान सबसे ज्यादा मार भारतीय बुनकरों और शिल्पकारों पर ही पड़ी थी।
गांधी जी के कुछ अनुयायियों ने इस बाबत सोचना शुरू किया। सरकार पर दबाव डालकर उन्होंने बुनकरों के हित में काम करने के लिए कदम आगे बढ़ाया। हस्तशिल्प की समस्याओं पर सरकार को सलाह देने और उनके संवर्धन एवं विकास की खातिर सुझाव देने के लिए 1952 में अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड की स्थापना की गई थी।
बोर्ड ने बुनकरों के लिए कई योजनाएं बनाई। बुनकर और शिल्पकार को अपनी बात रखने का एक मंच मिल गया। यह एक ऐसी संस्था थी, जहां पर लोग सरकार के साथ सीधे संवाद कर सकते थे।
प्रो. आनंद कुमार के अनुसार, ये बुनकर और इनके द्वारा बनाए गए कपड़े हमारी एकता का प्रतीक हैं। अखिल भारतीय हथकरघा बोर्ड को खत्म करने की बजाए उसमें सुधार किए जा सकते थे। जो संस्था 1952 से चली आ रही हो और जिसके माध्यम से एक बुनकर अपनी समस्या बताता हो, उसे खत्म करने का औचित्य समझ में नहीं आ रहा।
अच्छा होता कि मौजूदा सरकार बुनकरों की इस संस्था को स्वावलंबी एवं बलवान बनाते। एक तरफ सरकार कहती है कि लोकल को वोकल बनाओ और वोकल को ग्लोबल बनाओ। हथकरघा का कामकाज कश्मीर से लेकर केरल तक फैला है। उत्तर पूर्व और देश के दूसरे हिस्से इससे अछूते नहीं हैं।
बुनकर तो हमारे देश के आभूषण हैं। केंद्र सरकार ने अनुचित निर्णय लेकर इस संस्था को खत्म कर दिया। कोरोना संक्रमण के दौरान जब बड़ी-बड़ी कंपनियां बंद हो गईं, तब यह हथकरघा उद्योग चलता रहा। व्यापार और बाजार, दोनों को हथकरघा ने सबलता प्रदान की है।
सरकार को चाहिए था कि वह गांधी के सपनों और आजादी की विरासत को संजोए रखने के लिए शिल्पकारों का सम्मान करती। इस संगठन की नियमित बैठकों का इंतजाम किया जाता। हथकरघा क्षेत्र से जुड़े मामलों में एआईएचबी को अहम दर्जा देकर सरकार स्वतंत्रता आंदोलन की इस विरासत को बचाने का प्रयास कर सकती थी।
बताया जाता है कि पिछले छह साल से एआईएचबी की कोई बैठक नहीं हुई थी। ये अलग बात है कि हथकरघा क्षेत्र ने आज विभिन्न राज्यों और केंद्र सरकार के कई मंत्रालयों में अपनी पहचान बना रखी है। किसी एक मंत्रालय के तहत इस संस्था को नहीं लाया गया। इसका कुछ हिस्सा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम स्तर के उद्योग वाले मंत्रालय में आता है।
कपड़ा मंत्रालय भी इसे अपना बता देता है। ग्रामीण विकास मंत्रालय भी इस पर अपना दावा ठोक देता है। इसके समकक्ष खादी का अपना एक अलग ही मंत्रालय है। 2014 के दौरान सत्ता में आने से पहले भाजपा ने हथकरघा और हस्तशिल्प के लिए अलग से एक मंत्रालय बनाने की बात कही थी।
पार्टी ने इसे अपने घोषणा में भी जगह दी थी। आनंद कुमार कहते हैं कि अब वही पार्टी इस संस्था को नहीं बचा सकी। ये केवल इच्छाशक्ति की बात है। सरकार को लग रहा था कि यह बोर्ड ठीक से काम नहीं कर पा रहा है, तो उसमें बदलाव किए जा सकते थे।