गिरीपार क्षेत्र के रेणुकाजी, शिलाई, राजगढ़ और साथ लगते शिमला जिला के अधिकतर गांवों में बुधवार को लोहड़ी का पर्व धूमधाम से मनाया गया। रेणुका जी एवं शिलाई क्षेत्र में इस त्योहार को अलग और अनूठे अंदाज में मनाया गया। लोगों ने लोहड़ी से तीन दिन पहले ही इस त्योहार को मनाना शुरू कर दिया था।
त्योहार के पहले दिन गांव की महिलाएं गेहूं, चावल, भंगजीरा, भांग का मूड़ा और चौलाई एवं तिल के लड्डू बनाए गए। अब इन व्यंजनों को घर के लोग और मेहमान पूरी सर्दी में बड़े चाव से खाएंगे। वहीं, युवक-युवतियों ने एक दूसरे के गांव जाकर पशुओं के लिए चारा लाया। इसे खड़यांटी कहते हैं। लोहड़ी के दूसरे दिन को डिमलांटी के नाम से जाना जाता है। इस दिर हर घर में गेहूं के आटे को गुड़ वाले पानी में उबालकर देसी घी के साथ खाया जाएगा।
लोहड़ी के तीसरे दिन कटते हैं बकरे
वहीं, लोहड़ी से तीसरे दिन को स्थानीय भाषा में उतरांटी के नाम से जाना जाता है। इस दिन सुबह से ही गांव के युवकों की टोलियां अपने-अपने हथियार लेकर एक दूसरे के गांव में बकरा काटने पहुंचेंगे। इससे पहले सभी ग्रामीण एकत्र होकर अपने ग्राम देवता से लोहड़ी पर बकरे काटने की इजाजत लेते हैं। इसके बाद गांव में एकत्रित होकर एक के बाद एक बकरे की बलि दी जाएगी। सबसे बड़े बकरे की गर्दन को एक धड़ से अलग करने वाले व्यक्ति को बहादुर माना जाता है। इसके बाद मकर संक्रांति का पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा। सभी घरों से ब्राह्मणों को अन्न और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है।