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एनएचएम कर्मी पेन डाउन हड़ताल पर, मरीज रहे परेशान

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नाहन मेडिकल कॉलेज में पेन डाउन हड़ताल के दौरान एनएचएम के तहत सेवारत कर्मी। - फोटो : NAHAN
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नाहन/पांवटा साहिब (सिरमौर)। जनपद सिरमौर के स्वास्थ्य संस्थानों में एनएचएम के तहत सेवाएं दे रहे कर्मचारी बुधवार को पेन डाउन हड़ताल पर डटे रहे। नियमितीकरण की मांग पर अड़े कर्मचारियों ने प्रदेश सरकार से अपनी मांग को दोहराया। साथ ही चेताते हुए कहा कि यदि जल्द ही उनकी मांग पर गौर नहीं किया तो आंदोलन तेज कर दिया जाएगा।
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एनएचएम कर्मियों में चिकित्सक, फार्मासिस्ट, काउंसलर, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, सुपरवाइजर और लैब तकनीशियन शामिल होने के कारण मरीज भी परेशान रहे। जिले के अन्य अस्पतालों सहित मेडिकल कॉलेज नाहन में भी मरीजों को दिक्कतें झेलनी पड़ीं। अनुबंध कर्मचारी स्वास्थ्य समिति संघ (एनएचएम) सिरमौर के जिला अध्यक्ष सुनील शर्मा ने बताया कि स्वास्थ्य समिति अनुबंध कर्मचारी संघ ने प्रदेश सरकार से 25 जनवरी तक स्थायी नीति बनाने का अनुरोध किया था, लेकिन सरकार ने दो फरवरी तक भी इस संदर्भ में कोई कार्रवाई नहीं की। अब राज्य संगठन के निर्देशानुसार तीन से छह फरवरी तक काम छोड़ो हड़ताल जारी रहेगी।
उन्होंने कहा कि कर्मचारी पिछले 20 से 22 वर्षों से स्वास्थ्य विभाग में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन अभी तक सरकार ने उनकी कोई सुध नहीं ली है। विभिन्न वर्गों में कर्मचारी लंबे अरसे से न्यूनतम वेतन पर काम कर रहे हैं जिससे परिवार का पालन पोषण करना भी मुश्किल हो रहा है।
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उधर, स्वास्थ्य खंड राजपुर के एनएचएम कर्मचारियों ने भी बुधवार से पेन डाउन हड़ताल शुरू की। इस दौरान कर्मचारियों ने पांवटा साहिब सिविल अस्पताल के बाहर इकट्ठे होकर सरकार के उदासीन रवैये के प्रति रोष प्रकट किया। पेन डाउन हड़ताल में हिमाचल प्रदेश स्वास्थ्य समिति अनुबंध कर्मचारी संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉक्टर हिमांशु कौशिश, रविंद्र सिंह, डॉ. सुमित, डॉ. नम्रता, डॉ. अंजू, रामदत्त राणा, प्रवीण मित्तल, कौशल्या, महेंद्र, रणजीता, संतोष, मोनिका, इंदूबाला व उर्मिल आदि शामिल रहे।
डॉ. हिमांशु कौशिक ने कहा कि प्रदेश सरकार से जायज मांगें उठाई जा रही हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के कर्मचारियों के लिए स्थायी नीति बनाई जाए। सभी कर्मचारियों की पोलियो, लैप्रोसी, एमआर वैक्सीनेशन व स्वास्थ्य कार्यक्रमों में अहम भूमिका रही है। फिर भी यह वर्ग सदा ही सरकार की अपेक्षाओं का शिकार रहे हैं। इसलिए मजबूरन आंदोलन का रुख करना पड़ा है।
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