रोहडू़। मंडियों में सेब के दाम में लगातार गिरावट होने से बागवानों को खासा नुकसान झेलना पड़ रहा है। हालत यह है कि सोलन, पंचकुला औरर परवाणू की मंडियों में दस दिन पहले तक साढे़ तीन से चार हजार रूपए प्रति पेटी बिकने वाले सेब के दाम अब दो हजार रुपए तक गिर चुके हैं। हल्के रंग और छोटे आकार के सेब पांच सौ रुपए से एक हजार रुपए प्रति पेटी दाम मिल रहे हैं। इसस बार अधिक पैदावार और प्रतिकूल मौसम के कारण सेब का आकार विकसित नहीं हो सका है। इस वजह से मंडियों में छोटे सेब के लिए खरीदार लगातार पीछे हटते जा रहे हैं।
प्रदेश में सेब सीजन तेजी से रफ्तार पकड़ रहा है। मगर मंडियों में सेब के दाम में लगातार गिरावट होने के कारण बागवानों को साल भर बगीचों के रखरखाव और अन्य खर्चे पूरा करने की चिंता सताना शुरू हो चुकी है। ओले से खराब सेब की पेटी पांच सौ रुपए से एक हजार रुपए तक बिक रही है।
बागवान बृजलाल और ठाकुर प्रेम लाल नने बताया कि सेब की एक पेटी परवाणू सोलन और पंचकुला की मंडियों तक पहुंचाने अज्ञैर पैकिंग पर ही बागवानों का करीब चार सौ रुपए तक खर्च होता है। साल भर बगीचों में सेब की उत्पादन लागत बीस रूपए प्रति किलो तक अलग है। बीस किलो प्रति पेटी सेब छह से सात सौ रूपए बिकने पर उन्हें नुकसान उठाना पड़ रहा है।
सीजन रफ्तार पकड़ते ही शुरू हो जाती है धोखाधड़ी : हरीश चौहान
हिमाचल प्रदेश फल फूल एवं सब्जी उत्पादक संघ के प्रदेश अध्यक्ष हरीश चौहान ने बताया कि बागवानों के साथ हर साल पीक सीजन के दौरान मंडियों में इसी प्रकार की धांधलियां होती है।
छोटे आकार का सेब पैदा हुए तो खरीदार बडे़ आकार के सेब की मांग करते हैं। जब बडे़ आकार का सेब तैयार होता तो छोटे सेब की डिमांड दी जाती है। उन्होंने कहा बागवान सेब को अच्छी तरह तैयार होने दे। कच्चे सेब को मंडियों में न लाएं।
मंडियों में इसी तरह दाम गिरते रहे तो बागवान सेब को कोल्ड स्टोर में रखने का प्रयास करें। मंडियां डिमांड और सप्लाई के आधार पर ही स्थिर हो सकती है। मंडियों में सेब की अधिक पहुंच के कारण इस प्रकार की मनमानी के खिलाफ सरकार को आवाज उठाने की जरूरत है। इसके लिए सरकार को अधिक से अधिक सीए स्टोर स्थापित करने चाहिए।
पंचकुला सेब मंडी आढ़ती एसोसिएशन के प्रधान बृज मोहन उर्फ राजू भाई का कहना है कि अच्छे सेब के दाम दो दिन से दो हजार रुपए प्रति पेटी के आसपास है। छोटे आकार और ओले वाले सेब को बेचने में कम दाम मिलने से उन्हें भी परेशानी हो रही है। पहले मंहगा सेब खरीदने के बाद अब खरीदार अधिक दाम पर सेब लेने के लिए तैयार नहीं है। फल को अधिक समय के लिए रोका भी नहीं जा सकता है। मगर उनका प्रयास रहता कि बागवानों को अच्छे दाम मिले। अब यह खरीदार पर ही निर्भर करता है।