उदयपुर (लाहौल-स्पीति)। शीत मरुस्थल लाहौल घाटी में उत्पादित रसीला सेब जल्द ही देश की विभिन्न मंडियों में दस्तक देगा। घाटी में सेब तुड़ान का कार्य बागवानों ने शुरू कर दिया है। सेब व्यापारियों ने भी यहां ढेरा डाल दिया है।
कुछ व्यापारी थोक रेट में ही सेब की खरीदारी कर रहे हैं। इसके चलते बागवानों को 1000 से लेकर 1300 रुपये तक सेब के प्रति पेटी दाम मिल रहे हैं। बड़े बागबानों ने अपने सेब के बगीचे ठेके पर ही दे दिए हैं। हालांकि अटल टनल रोहतांग के बन जाने से इस बार घाटी में पहले की अपेक्षा अधिक व्यापारियों ने सेब की खरीदारी शुरू की है। टनल बनने से पूर्व यहां सेब की खरीदारी करना व्यापारियों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं रहता था। सितंबर माह के बाद जब कभी मौसम खराब हो जाने से रोहतांग दर्रे में बर्फ पड़ जाती है तो सेब उत्पादकों व व्यापारियों को नुकसान उठाना पड़ता था।
घाटी के 80 फीसदी से अधिक लोग कृषि पर निर्भर हैं। करीब दो दशक पूर्व से अब तक 900 हेक्टेयर भूमि पर सेब का भी उत्पादन हो रहा है। टनल बन जाने से मालवाहक वाहनों के किराये में कमी आई है। फसलें भी समय पर देश की विभिन्न मंडियों में पहुंच रही हैं। बागवान रमेश कुमार, सुरेंद्र ठाकुर, सुरेश कुमार और राजू ने कहा कि अटल टनल रोहतांग बनने से पूर्व रोहतांग दर्रा होकर सफर लंबा होता था। साथ ही सड़क की दशा ठीक नहीं होने व जाम लगने से फसलें समय पर मंडियों में नहीं पहुंच पाती थी। इसके कारण व्यापारी भी नुकसान का हवाला देकर फसलों के दामों में कटौती कर देते थे। ठोलंग गांव के सुरेश कुमार ने कहा कि उन्होंने सेब की प्रति पेटी ए ग्रेड 1300 रुपये तथा बी ग्रेड 650 रुपये के हिसाब से ठेके पर ही बेच दी है। उधर, जिला बागवानी उपनिदेशक डॉ. सोनम अंगरुप ने कहा कि लाहौल में उत्पादित रसीले सेब का छिलका मोटा होता है। इसके चलते यह अधिक टिकाऊ होता है।