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फोरलेन परियोजना बनी सरकार व प्रभवितों के गले मे फांस

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जसूर (कांगड़ा)। वर्ष 2015 से शुरू हुई फोरलेन परियोजना प्रदेश सरकार और सरकारी तंत्र के उदासीन रवैये के चलते 6 वर्ष बाद भी फोरलेन प्रभावितों पर भारी पड़ रही है। वहीं, पठानकोट से कंडवाल तक के पंजाब के भाग में स्थित सड़क का निर्माण कार्य दो वर्ष पहले शुरू हुआ था और पिछले वर्ष समाप्त हो गया है।
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वहीं, कंडवाल से सीयूणी तक के हिमाचल के भाग का 37 किलोमीटर के प्रथम चरण की प्रक्रिया छह साल में अभी तक पूरी ही नहीं हो पाई है।
तब से लेकर अब तक यह परियोजना सरकार और सरकारी तंत्र के कार्यकलापों के चलते फोरलेन पीड़ितों के लिए परेशानी का सबब बन कर रह गई है। गौरतलब है कि जब भी किसी परियोजना का सर्वे किया जाता है तो इस बात पर गौर की जाती है कि योजना में कम से कम लोग प्रभावित हों, लेकिन इस फोरलेन परियोजना में कंडवाल से लेकर बोड़ तक स्थित सभी कस्बे जैसे कंडवाल, नागाबाड़ी, राजा का बाग, छतरौली, जसूर, जाच्छ और बोड़ तक के कस्बों के बाजारों के बड़े भाग में भारी तोड़फोड़ के अलावा इस क्षेत्र में 1000 से ज्यादा वृक्षों का कटना तय है। बताया जाता है कि सर्वे का कार्य किसी निजी एजेंसी को सौंपा गया था और उसे इस कार्य के लिए करोड़ों की राशि दी गई थी, लेकिन प्रावधान के बावजूद सर्वे कंपनी ने स्थानीय निकायों और जनप्रतिनिधियों को इस कार्य में शामिल ही नहीं किया। अन्थया इसी सड़क के समानांतर खाली पड़ी भूमि पर एक बाईपास सड़क का विकल्प मौजूद था और इसकी जानकारी 2016-17 में तत्कालीन सांसद को संघर्ष समिति नूरपुर की ओर से दी गई थी। लेकिन हाईवे प्राधिकरण ने इस संबंध में कोई गौर नहीं किया। दूसरी ओर भूमि अधिग्रहण के मामले में भी जमीन की पैमाइश और उस पर बुर्जियां लगाते समय भू मालिकों को उसकी सूचना और जानकारी तक नहीं दी जाती रही।
-परियोजना के सर्वे, पैमाइश, बुर्जियों को लगाने जैसे किसी भी कार्य में फोरलेन एक्ट के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया है। भू मालिकों को बिना बताए कभी एक स्थान तो कभी दूसरे स्थान तक बुर्जियों को लगाया गया। सरकार ने भूमि का 4 गुना मुआवजा देना था तो उसकी जगह 40 फीसदी कटौती कर के प्रभावितों के साथ अन्याय किया है। -ठाकुर सूरम सिंह, राजस्व प्रमुख भारतीय किसान संघ
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-छह साल बीत गए, लेकिन कंडवाल से सीयूणी तक के 37 किलोमीटर के प्रथम चरण की इस योजना का कोई भी कार्य संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। सर्वे मुआवजा और पैमाइश आदि कार्यों में फोरलेन प्रभावित लोगों के साथ अन्याय किया गया है। अगर सही ढंग से सर्वे होता तो कितने बाजार भवनों और वृक्षों का वजूद न मिटता तो अब नई कमेटी 30 जनवरी तक अपनी रिपोर्ट सौंपेगी, जिस पर प्रभावितों की उम्मीदें टिकी हुई है।- विजय हीर, महासचिव फोरलेन संघर्ष समिति
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