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आर्थिक सुनामी से बच पाएगा हिमाचल?

Thu, 28 Feb 2013 08:39 AM IST
राजेश मंढोत्रा/शिमला
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यूपीए सरकार के चुनावी बजट में क्या पी. चिदंबरम हिमाचल को आर्थिक सुनामी से बचाएंगे? या रेल मंत्री पवन कुमार बंसल की तरह की बाजीगरी में हिमाचल उलझ जाएगा? इन सवालों के जवाब गुरुवार को संसद में पेश होने वाले आम बजट से मिलने हैं।
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जो हकीकत सामने है, वह ये कि यदि केंद्र सरकार ने हिमाचल का साथ नहीं दिया तो प्रदेश में 90 के दशक का वह दौर लौट सकता है, जिसमें ओवरड्राफ्ट में जाने के बाद राज्य के कोषागार पर तालाबंदी की नौबत आई थी।

हिमाचल अपने संसाधनों के सहारे खड़ा हो पाने वाला राज्य नहीं है। राज्य अपनी कमाई के सभी संसाधनों से साल में करीब 6000 करोड़ रुपये कमाता है। वेतन और पेंशन पर ही 9000 करोड़ का खर्चा है। दूसरी ओर, पूर्व में लिए गए ऋणों की अदायगी भी अब वार्षिक योजना से ज्यादा हो गई है। राजनीतिक जरूरतें पूरी करते-करते सरकारी खजाना लगभग खाली है।
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पहले यहां भाजपा और केंद्र में कांग्रेस सरकार थी तो भेदभाव के आरोप केंद्र पर लगते थे। अब यहां और दिल्ली में कांग्रेस की सरकारें हैं तो हिमाचल ने भी अपने हितों की पैरवी इस बार आम बजट से पहले तेज की थी। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के सामने 6575 करोड़ रुपये का विशेष आर्थिक पैकेज देने की मांग रखी है। इसके अलावा केंद्रीय प्रायोजित स्कीमों में 90:10 की दर से पैसा देने की पैरवी की गई।

राज्य में दोबारा निवेशक लाने के लिए औद्योगिक पैकेज को बहाल करने को भी कहा है। इसलिए हिमाचल की नजर आम बजट से ज्यादा आर्थिक या औद्योगिक पैकेज की ओर होगी। आर्थिक सुधारों की राह पर चले चिदंबरम इनमें से हिमाचल को क्या देते हैं, इसका इंतजार है।

मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का कहना है कि सरकारी खजाने की हालत ठीक नहीं है। धूमल सरकार ने समझदारी से खर्चे नहीं किए। हालत ये है कि केंद्र सरकार की सहायता के बिना चलना संभव नहीं है। इसलिए विशेष आर्थिक पैकेज और औद्योगिक पैकेज को बहाल करने की बात भारत सरकार से उठाई है। घबराने की बात नहीं है, व्यवस्था ठीक करेंगे।

हिमाचल की तीन चिंताएं
1. प्रति व्यक्ति वेतन खर्च
- राज्य की 68 लाख जनसंख्या पर 1.91 लाख कर्मचारी हैं। यह फौज पड़ोसी राज्यों में सर्वाधिक है। प्रति व्यक्ति वेतन खर्च 5972 रुपये। 9000 करोड़ वेतन और पेंशन पर खर्च हो रहा है। सभी संसाधनों से कमाई महज 6000 करोड़ है।

2. लोन की किस्त और ब्याज
- 27000 करोड़ रुपये का लोन हिमाचल पर है। इसकी किस्त और ब्याज के भुगतान पर 4400 करोड़ रुपये का भुगतान हो रहा है। जबकि इस साल वार्षिक योजना 4100 करोड़ रुपये प्रस्तावित है। यानी, विकास से ज्यादा लोन पर खर्चा।

3. राजनीतिक घोषणाएं
- पूर्व सरकार ने चुनावी साल में कर्मचारियों को रिझाने के लिए कई ऐलान किए। सैलरी बिल 5400 करोड़ से बढ़कर 6500 करोड़ पहुंच गया। अब नई सरकार के बेरोजगारी भत्ते के भुगतान को लेकर वित्त विभाग की सांसें अटकी हुई हैं।
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