इस पर सुनवाई करते हुए जिला अदालत शिमला के न्यायाधीश दविंदर कुमार की अदालत ने कहा कि आवेदक धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 45 के तहत आवश्यक दो शर्तों को पूरा करने में विफल रहा है।अदालत ने कहा कि ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है, जिससे यह माना जा सके कि आवेदक धन शोधन के अपराध का दोषी नहीं है। साथ ही यह संभावना भी है कि यदि उसे जमानत पर रिहा किया जाता है तो वह गवाहों को प्रभावित कर सकता है या सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता है।
अदालत ने अभियोजन पक्ष के आरोपों, पीएमएलए की धारा 3 के तहत अपराध में आरोपी की संलिप्तता, गबन की गई छात्रवृत्ति राशि और मामले के वर्तमान चरण को ध्यान में रखते हुए कहा कि आवेदक जमानत पर रिहाई का हकदार नहीं है। आवेदक की ओर से यह दलील दी गई थी कि उसके खिलाफ पूरी कार्यवाही, विशेष रूप से गिरफ्तारी और निरंतर कारावास, कानून के विपरीत है। उसने बताया कि वह मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। अदालत ने सभी दलीलों को सुनने के बाद जमानत आवेदन को खारिज कर दिया।
आरोप है कि उच्च शिक्षा निदेशालय और बैंक अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर अवैध तरीके से छात्रवृति राशि प्राप्त की। उसके संस्थानों के माध्यम से 24.52 करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति गबन की गई। कुल गबन की गई राशि 200 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। हिमाचल सरकार की सिफारिश पर सीबीआई ने 7 मई 2019 को एफआईआर दर्ज की थी। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 19 जुलाई 2019 से मनी लॉन्ड्रिंग के जांच शुरू की। इसके बाद आरोपी हितेश गांधी और उसके सह आरोपियों को 29 अगस्त, 2023 को गिरफ्तार किया गया। यह भी आरोप है कि आरोपी हितेश गांधी ने केसी ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के माध्यम से 4.42 करोड़ रुपये की आपराधिक आय प्राप्त की।