मामला वर्ष 1992 का है, जब याचिकाकर्ता शिक्षक प्रकाश चंद को राजकीय प्राथमिक पाठशाला सिंबल में स्वयंसेवी शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। उनकी नियुक्ति को एक अन्य अभ्यर्थी ने ट्रिब्यूनल में चुनौती दी थी। लंबी कानूनी लड़ाई के बीच 1998 में याचिकाकर्ता की सेवाओं को नियमित कर दिया गया था। हालांकि, 2004 में ट्रिब्यूनल ने उनकी नियुक्ति रद्द कर दी, जिसके बाद विभाग ने 21 फरवरी 2005 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी थी। याचिकाकर्ता प्रकाश चंद इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे, जहां अदालत ने उनकी बर्खास्तगी पर रोक लगा दी और उनकी नियुक्ति को वैध ठहराया। सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार ने तर्क दिया कि नो वर्क नो पे के सिद्धांत के आधार पर 68 दिनों का वेतन नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उस अवधि में शिक्षक ने काम नहीं किया था। अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया।
नगर पंचायत धर्मपुर के गठन पर हाईकोर्ट की मुहर, याचिका खारिज
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से मंडी जिले की नवगठित नगर पंचायत धर्मपुर को लेकर 20 दिसंबर 2024 को जारी अधिसूचना को सही पाते हुए इसे बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि इस अधिसूचना में कोई भी अवैधता, मनमानापन और कानून का उल्लंघन नहीं पाया गया है। अदालत ने अधिसूचना की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार ने इस नगर निकाय का गठन करते समय सभी कानूनी प्रक्रियाओं और सांविधानिक प्रावधानों का पालन किया है। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद धर्मपुर नगर पंचायत के गठन पर मुहर लग गई है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने फैसले में कहा है कि उपायुक्त मंडी ने फील्ड स्टाफ के माध्यम से जनसंख्या, आय और रोजगार के गैर-कृषि स्रोतों का विस्तृत आकलन किया था। क्षेत्र में 6 सरकारी और 4 निजी शिक्षण संस्थान हैं और इनकी अनुमानित वार्षिक आय 29 लाख रुपये तक पहुंचने की संभावना है, जो एक नगर पंचायत के लिए पर्याप्त है।
अदालत ने पाया कि ग्रामीणों की ओर से दी गई आपत्तियां ठोस तर्कों के बजाय केवल विरोध के लिए दर्ज की गई थीं। गौरतलब है कि याचिकाकर्ता राकेश कुमार और अन्य ग्रामीणों ने याचिका दायर कर 20 दिसंबर 2024 को जारी सरकारी अधिसूचना को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि नगर पंचायत बनाने की प्रक्रिया में जनता की आपत्तियों पर ध्यान नहीं दिया गया है।। क्षेत्र को ट्रांजिशनल एरिया घोषित करने के लिए जनसंख्या और आय के मानकों की अनदेखी की गई।मनरेगा और बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सुविधाओं पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को नहीं परखा गया। आपत्तियां दर्ज करने के लिए पर्याप्त समय 4-6 सप्ताह के बजाय केवल 2 सप्ताह दिया गया। वहीं राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता अनूप रतन ने अदालत को बताया कि सरकार ने नगर निगम अधिनियम, 1994 के संशोधित प्रावधानों के तहत ही 2 सप्ताह का समय दिया था। उन्होंने रिकॉर्ड पेश करते हुए बताया कि धर्मपुर की जनसंख्या 2000 से अधिक है। क्षेत्र में कॉलेज, एचआरटीसी डिपो और कई शैक्षणिक संस्थान मौजूद हैं, जो इसके शहरी विकास की पुष्टि करते हैं।