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आजादी के बाद देखे विकास के कई आयाम, जिला को नहीं हुआ फायदा

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बिलासपुर। जिस भाखड़ा बांध को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने आधुनिक भारत का मंदिर का करार दिया था, उसी के विस्थापित आजादी के 74 साल बाद भी देश के लिए जमीन और घरों की कुर्बानी देने का मोल चुका रहे हैं। आजादी के बाद ऋषि ब्यास की नगरी बिलासपुर ने विकास के कई आयाम देखे लेकिन इस विकास से जिला को कोई फायदा नहीं हुआ। बिजली परियोजनाओं से लेकर सीमेंट कारखाने तक जिला में स्थापित हुए लेकिन जिला के लोगों को बीमारी, बेरोजगारी और विस्थापन के सिवा कुछ हाथ नहीं लगा।
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ऋषि ब्यास की नगरी बिलासपुर में स्वतंत्रता के बाद कई बदलाव आए। विकास की बात करें तो यहां पर स्थित सीमेंट कारखानों से लेकर बिजली परियोजनाओं से देश के कोने कोने के लोग लाभान्वित होते हैं। वहीं वर्तमान में हाइड्रो इंजीनियरिंग कॉलेज, फोरलेन, रेलवे, एम्स आदि बड़ी परियोजनाओं का निर्माण जोरों पर है। इस सबके बावजूद जिला के लोगों को इन परियोजनाओं का कोई लाभ नहीं मिला। हालांकि इनकी भरपाई के लिए अपनी सेहत और सुकून दाव पर लगाना पड़ रहा है। आजादी के बाद तत्कालीन कहलूर रियासत में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1948 में भाखड़ा बांध की नींव रखी। उसके बाद 1961 में पुराना बिलासपुर पानी में डूब गया, उसके साथ ही 8वीं और 9वीं शताब्दी में बने ऐतिहासिक रंगनाथ मंदिर समेत करीब एक दर्जन मंदिर भी विस्थापित हुए थे।
60 साल बाद भी नहीं मिला मालिकों को हक
9 अगस्त 1961 में 800 मेगावाट के भाखड़ा बांध के लिए बनाई गई गोविंद सागर झील में पानी भरा गया। पुराना बिलासपुर पानी में डूब गया और 354 गांवों के 52 हजार लोगों को देश के विकास के लिए अपनी जमीन और घरों का त्याग करना पड़ा। आज भी हालात यह हैं कि इन लोगों को सरकार ने आज भी न जमीन दी और न ही स्थायी घर इनके पास हैं। हालात यह हैं कि जिन घरों का निर्माण इन्होंने खुद किया उसके मालिक भी यह खुद नहीं है।
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हर साल पानी में डूबते हैं ऐतिहासिक मंदिर
स्वतंत्रता के बाद देश ने चाहे कितना विकास किया हो लेकिन बिलासपुर के लुहणू में ऐतिहासिक मंदिर हर साल पानी में समाधि लेते हैं। सरकार ने इन्हें यहां से शिफ्ट करने की मुहिम तो चलाई लेकिन उसे सिरे नहीं चढ़ा सके।
जिला में कई कारखाने और अन्य परियोजनाएं
जिला में दो सीमेंट कारखाने एसीसी और अल्ट्राटेक हैं। लेकिन इन कारखानों में बनने वाले सीमेंट के दाम बाहरी प्रदेशों मे सस्ते हैं। बाहरी राज्यों के युवा इन कारखानों में नौकरी करते हैं। लेकिन जिला को न सीमेंट सस्ता है और न ही इन कारखानों में स्थायी नौकरी। इसके अलावा भाखड़ा और कोलबांध बिजली प्रोजेक्ट हैं। लेकिन जिला में बिजली के दाम सस्ते नहीं है। इन परियोजनाओं में भी बाहरी जिलों और बाहरी प्रदेशों के युवा नौकरी कर रहे हैं।
भाखड़ा विस्थापितों के हक के लिए मैंने मुहिम शुरू की है। जब तक इनको पूरा हक नहीं मिल जाता तब तक मेरी लड़ाई जारी रहेगी। वीरभद्र सरकार ने विस्थापितों के लिए काम किया था। लेकिन वर्तमान सरकार विस्थापितों को उनका हक देने में आनाकानी कर रही है। भाखड़ा विस्थापितों को उनका मालिकाना हक दिलवाया जाएगा।
-बंबर ठाकुर, पूर्व कांग्रेस विधायक
विस्थापन के 60 साल बाद भी भाखड़ा विस्थापित क्षेत्र का बंदोबस्त, विस्थापितों की कब्जे वाली भूमि का स्वामित्व, विस्थापितों को बिजली-पानी मुफ्त उपलब्ध करवाना, पीने का पानी व सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी झील से मुहैया करवाया जाना, भाखड़ा विस्थापितों के बच्चों को भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड व सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रदान करना, भाखड़ा से बिजली का उत्पादन का 7.19 फीसदी हिस्सा जो हिमाचल सरकार को मिलता है, उस राशि को विस्थापितों व प्रभावितों के क्षेत्र में मूलभूत सुविधाएं प्रदान करने पर खर्च किया जाना, जिन भाखड़ा विस्थापितों को प्लॉट नहीं दिए उन्हें प्लॉट उपलब्ध कराना इन सब मांगों पर काम नहीं हुआ। भाखड़ा बांध से देश, सरकारें और भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड तो मालामाल है लेकिन विस्थापित आज भी बेघर हैं।
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-देश राज शर्मा, अध्यक्ष बिलासपुर ग्रामीण भाखड़ा विस्थापित सुधार समिति
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