दिल में कुछ कर गुजरने की इच्छा हो तो बड़ी से बड़ी बाधा भी आपको लक्ष्य हासिल करने से नहीं रोक सकती। इसी का सटीक उदाहरण है हरियाणा के सोनीपत की रहने वाली हॉकी खिलाड़ी निशा वारसी। निशा ने आर्थिक तंगी के बावजूद दृढ़ निश्चय और कड़ी मेहनत से खुद के लिए अलग मुकाम बनाया।
टोक्यो ओलंपिक के सेमीफाइनल में पहुंची भारतीय महिला हॉकी टीम की सदस्य रहीं निशा वारसी अब अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। बेटी की सफलता पर गौरवान्वित पिता शोहराब मोहम्मद व मां मेहरूप ने कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि लाडो यहां तक पहुंचेगी। विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए भारतीय महिला हॉकी टीम में स्थान बना चुकीं निशा वारसी दूसरी लड़कियों के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं।
पिता को लकवा हो गया तो मां ने फैक्टरी में काम कर बेटी को आगे बढ़ाया
निशा वारसी मूलरूप से मुरादाबाद, यूपी की रहने वाली हैं। निशा बताती हैं कि पिता शोहराब मोहम्मद करीब 50 साल पहले सोनीपत आकर किराये पर रहने लगे थे। पिता ने दर्जी का काम कर परिवार का पालन-पोषण किया। हम तीन बहनों व एक भाई को बेहतर शिक्षा व परवरिश के लिए माता-पिता ने कड़ा संघर्ष किया। वर्ष 2016 में पिता को लकवा हो गया था, जिसके बाद वह काम नहीं कर पाए।
मां मेहरून ने फैक्टरी में काम कर घर की जरूरतों को पूरा करने के साथ बेटी को आगे बढ़ाया। मैं हमेशा सोचती थी कि कुछ ऐसा करूं कि अपने परिवार की जिम्मेदारी उठा सकूं। इसी जद्दोजहद के बीच हॉकी के गुर सीखने के लिए कोच प्रीतम सिवाच के पास जाती थी। उन्होंने मार्गदर्शन किया और हॉकी में नाम कमाने का जज्बा जगाया। प्रीतम दीदी ने हर कदम पर मेरा साथ ही दिया। उन्हीं के मार्गदर्शन और सहयोग से आज इस मुकाम तक पहुंच पाई हूं।
सुबह पांच बजे पहुंच जाती थी मैदान पर
निशा बताती हैं कि हॉकी की लगन ऐसी थी कि सुबह पांच बजे मैदान पर पहुंच जाती थी। दो घंटे अभ्यास कर वापस आती और स्कूल चली जाती थी। स्कूल से आने के बाद होमवर्क करती और दोपहर बाद तीन बजे फिर मैदान पर हॉकी के गुर सीखने पहुंच जाती थी। इस बीच कई स्थानों पर खेलने का मौका मिला।
घर की जिम्मेदारियां संभालने का जुनून रहता था। कुछ महीने बाद ही खेल कोटे से रेलवे में नौकरी मिल गई। इसके बाद घर की पूरी जिम्मेदारियां संभाल लीं। निशा कहती हैं कि लक्ष्य निर्धारित कर उसे पाने के लिए संघर्ष किया जाए तो बड़ी से बड़ी बाधा भी आपका रास्ता नहीं रोक सकती।