स्वतंत्रता सेनानी बख्तावर सिंह का बेटा सतबीर सिंह मिले ताम्रपत्र दिखाता हुआ। संवाद
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देश की आजादी के लिए चले संघर्ष में गांव महलाना निवासी स्वतंत्रता सेनानी बख्तावर सिंह अनेक बार जेल गए और अंग्रेजों की यातनाएं सही। उसके बावजूद उनके हौसले कभी पस्त नहीं हुए। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उनके साथ आंदोलन में हमेशा अग्रणी पंक्ति में रहे। अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए अनेक बार अंग्रेजों की लाठियां खाईं और आगे बढ़ते रहे। स्वतंत्रता सेनानी स्व. बख्तावर सिंह के पौत्र सुशील कुमार ने आजादी में दिए गए अपने दादा के योगदान पर गर्व करते हुए पुरानी यादें साझा कीं।
गांव महलाना निवासी सुशील कुमार ने बताया कि दादा स्व. बख्तावर सिंह अक्सर आजादी के संघर्ष की कहानी बयां करते थे। वह बताते थे कि देश को गुलामी की बेड़ियों से आजादी दिलाने के लिए अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के साथ काम किया और आजादी के संघर्ष को आगे बढ़ाया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उनके साथ रहे और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए देश को आजाद कराने में योगदान दिया। वे बताते थे कि इस दौरान अनेक बार अंग्रेजों ने उन्हें कैद किया और सियालकोट (पाकिस्तान), काला पानी (अंडेमान निकोबार), रोहतक की जेलों में रखा। काला पानी में वे लंबे समय तक काल कोठरी में कैद रहे। वह कोठरी इतनी छोटी थी कि उसमें न ठीक से खड़े हो सकते थे और न ही सही तरीके से बैठ सकते थे। अंग्रेजों की यातनाएं सहने के बावजूद देश को आजाद कराने का जज्बा बढ़ता ही गया।
अंग्रेज गांव में आते थे और मकान को सील लगा गिरफ्तार कर ले जाते
स्व. बख्तावर सिंह के पुत्र सतबीर सिंह ने बताया कि आजादी से पहले अंग्रेज हर महीने गांव आते थे। एक अंग्रेज भी गांव में आता था तो गांव में सन्नाटा छा जाता था। अंग्रेज घर पर आते और मकान पर सील लगाकर पिता को गिरफ्तार कर ले जाते थे। आजादी तक यह सिलसिला जारी रहा। पिता ने देश की आजादी के लिए कभी परिवार की तरफ भी ध्यान नहीं दिया। उन्होंने पूरा जीवन गरीबी में गुजार दिया। वर्ष 1980 में उनका देहांत हो गया।
सरकार की तरफ से मिले ताम्रपत्र
स्वतंत्रता सेनानी बख्तावर सिंह के पौत्र सुशील ने बताया कि आजादी के बाद सरकार की तरफ से सम्मान स्वरूप ताम्रपत्र मिले। अनेक स्थानों पर सम्मानित किया जाता था। करीब 15 साल से अब सरकार की तरफ से भी कोई चिट्ठी तक नहीं आई। देश को आजादी दिलाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के अनेक परिवार आज भी असुविधाओं के बीच जीवन यापन कर रहे हैं, जिनकी सुध लेने वाला भी कोई नहीं है।